Saturday, August 3, 2013

जय जय ..............

राम खिलावन पिछले कुछ दिनों से देश की तरह बेहाल थे कोई धनीधोरी नहीं था | बस यू ही जी  रहे थे , जी इस लिए रहे थे की उन्हें मौत नहीं आ रही थी जिसका वे बेसब्री से इंतजार कर रहे थे | मन भर गया था उनका लो लो चप्पो से |  हलाकान थे , परेशान थे रोज रोज अखबारों में छपी खबरों ने उन्हें सता रखा था | सोचते रहते थे की क्या हो गया है मेरे  देश को  देश को क्या देशवाशियो को ,फिर सोचने लगते की ये देश तो गौतम , गाँधी का है  ये देश  तो टैगोर ,भगत का है मेरा तो है ही नहीं क्या करू इसी उधेड़ बन में दिन गुजर रहे थे उनके .......|
बलभद्र आज का अखबार चबाये पडा था रामखिलावन ने एक खबर पठी की मुरैना में दाई ने पांच सौ रुपये नहीं दिए तो बच्चे को पटककर मार  डाला , बच्चे का बाप रिपोर्ट करने के लिए इधर उधर भटकता रहा ,क्या हो गया है हमें हमारे समाज को पैसे के लिए कितने आतुर है हम ,  इस देश में गरीब होना गुनाह है गरीब के लिए रोज योजनाये बनाई जाती है जिनके लिए अखवारो में रोज लाखो के विज्ञापन प्रसारित होते है जन जन जाने गरीबो के लिए जारी की गयी योजनाये उनका लाभ ले वे सभी जो गरीब है ,हमने गरीबो की एक परिभाषा भी परिभाषित  कर रखी  है  एक रेखा है उसके नीचे सब गरीब और उससे ऊपर के सब अमीर मतलब ऊपर  अमीर नीचे  गरीब |
जो नीचे होगा वो दबाया जायेगा या फिर दबा रहेगा ,कब तक दबा रहेगा जब तक उपर वालो का दबदबा रहेगा ऊपर वालो का दबदबा कब तक रहेगा जब तक नीचे वाले दबे रहेंगे कुल मिला के दबने  दबाने का खेल है  यह , ये और कुछ नहीं ऐसा कुछ कुछ रामखिलावन के दिमा ग में घुस रहा था  दिमाग में हलचल मची हुयी थी रेलमपेल विचार आ जा रहे थे रामखिलावन के ,तनाव के कारण उनका तन तमतमा गया था ,अब दबना नहीं है दबाना है ऐसा क्रांतिकारी विचार उन्हें उकसाए जा रहा था वो धीरे धीरे उसक रहे थे तभी बलभद्र ने अखवार एक तरफ फेका और जोर से जम्हाई ली रामखिलावन ने मौके की नजाकत को देखा और अखवार की पुंगी बना कर  बलभद्र के अधखुले मुह में डाल दी ,बलभद्र अचकचा गये ये ससुरा का है मुह खोलना भी गुनाह है रामखिलावन को समझते देर न  लगी एक और गुनाह इस देश में है जिसकी व्याख्या भारतीय दंड सहिंता में नहीं है | गुनाह  तो वही कहलायेगे जिनका जिक्र दंड सहिंता में होगा जिसके लिए कोई न कोई धारा उप धारा हो ,ऐसे तो कुछ भी कहते फिरो इनकम टैक्स थोड़े ही लगता है |
तो तय हुआ की गरीब होना देश में गुनाह नहीं है क्यों की दंड सहिंता में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है ...................

Wednesday, February 20, 2013

सब भउसा खाता है ...............

रामखिलावन जटिल समस्याओ के विकट हल खोज लेते थे एक जमाना ऐसा भी था ।  पर अब सब भ उ सा खाता है। रामखिलावन सरकार  को तलाश रहे है और वह  मिल नही  रही , लगता है सरकार चलते  चलते कही दूर निकल गयी ,किस  दिशा की ओर  निकल गयी कुछ पता नही चल  रहा, यह बात  यह साबित  करती  है  कि सरकार चलती है । और वह चलते चलते किसी भी तरफ निकल सकती है  पतली गली से ,मिल भी सकती है और नहीं भी यह सब आपकी कार गुजारी पर निर्भर करता है की आप क्या है और कहा विराजते है । सरकार तो कभी कभी चलते चलते आप के व्दार पर भी आ जाती है ,और आपके व्दार पर आ कर सो  भी जाती है । चलते चलते थक जाती है इस लिए सो जाती है कोई गुनाह करती है आप नहीं सोते है क्या ? की सरकार सो रही है बोल बोल कर उसे बदनाम करते रहते है अरे जो चलेगा वह थकेगा भी भईया ..........लेकिन कुछ लोग बिना कुछ करे भी थक थूका जाते है बिना काम  जैसे ट्रेन में बैठे आप है चल ट्रेन रही है और थक आप जाते  है । 
बैठे बैठे भी भईया कुछ लोग थक जाते है तब उनका क्या किया जाये ये तो सरकार है ,चल  रही है इसलिए उसका थकना भी  लाजमी है ,थकती है तो सो भी जाती है । इसमें बुरा क्या है कि सोती हुयी सरकार को भला  बुरा  कहा जाये ये तो आपकी सोच है , तुलसी बाबा भी जाते जाते  कह गए है जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी । 
 आप अपनी भावना बदले ,सब कुछ बदल जायेगा ,गली ,मोहल्ले बदल गये ।  राज्य ,प्रान्त बदल गये । भाषा ,बोली बदल गयी ।  आभूषन परिधान बदल गये । चाल चलन बदल गया ।युग बदल गया परिभाषाये बदल गयी । नेता बदल गये अभिनेता बदल गये  और एक आप है कि अपनी भावनाए नही बदल पा  रहे है ,।धिक्कार है प्रभु अपने को नही बदल पा रहे हो आप तो  कम से कम भावना बदल लो नहा नही रहे हो  तो कम से कम कपड़े  बदल लो सेंट - वेंट छिडक लो ,महकने लगो पूरा देश महकता नजर आएगा ,फील गुड करो भईया ..फीलगुड .........। फील और फीलिंग से ही तो सब कुछ होता है प्रभु , तुलसी बाबा कह तो गये है। कबीर भी तुम्हे सुधारते सुधारते चले गए ,कहते रहे बुरा जो देखन मै  चला  ,बुरा न मिलयो कोय जो दिल खोज आपना मुझसा बुरा न कोय और तुम ससुरे सरकार को भला बुरा कहते रहते हो वो भी चुनी हुयी सरकार को ,सीधे नरक में जाओगे ,गरम खौलते  तेल में पकौड़े  जैसे तले जाओगे तब पता चलेगा ,बदलो बदलो सरकार के प्रति अपनी भावना को, नही तो कही सरकार ही न बदल जाये ।
रामखिलावन ,सरकार को ढूढ़ रहे है जैसे भक्त भगवान को ढूढ़ते है । भक्त भगवान की भक्ति करते है पूजा अर्चना भी करते है फल फूल चढाते है मनोतिया मानते है पुरी  होने पर मालपुआ चढाते है कोई कोई तो गुप्त दान भी करते है भगवान  को मालामाल  करते है  वैसे ही जनता सरकार की आव भगत में लगी रहती है ,पूजा अर्चना करती रहती है मनौतिया मानती है फिर पूरा होने पर सरकार को दान ,गुप्त दान भी करती है सरकार के कुछ पुरोहित गुप्त दान लेने में पकड पकड़ा जाते है ये अलग बात है पर  उन्हें भी सरकार  फिर छुड़ाने में मदद  भी करती है ,सारे वेद  -  पुराण और सम्बन्धित पोथी पन्ना बदल देती है अपने भक्त को बचाने में सरकार कोई कसर  नही छोडती कैसे छोड़े जो .... वादा  किया है वो निभाना पड़ेगा ...... ।
कुल मिला के रामखिलावन कनफुजिया गए है कहते है सब भ उ सा खाता है बलभद्र .............. 


 
 
 

Wednesday, February 13, 2013

कुम्भ की कहानी से रामखिलावन रूबरू हो रहे है ,जाके  कुछ पुन्य कमाना चाहते है ,फोकट में जब मिल रहा है तो क्यों छोड़ा जाये ,पाप न लग जाये । कही कोई ऐसा भी विधान न हो ,कि जो कुम्भ में न जायेगा तो बेटा  मरोगे तो सीधे नरक में जाओगे लिखा हो ,फिर बिलबिलाते रहोगे ,फोकट में पुन्य मिल रहा था तो लुटा नहीं अब ससुरे हिसाब किताब में भिड़े है कि हमने इतने पुन्य किये इतने पाप ।
सो रामखिलावन बलभद्र को लिए प्रयाग के लिए रवाना हो लिए साथ में दंड कमंडल लिए ,दाड़ी तो पहले से बढ़ी थी । रेलों में रेलम रेल मची हुयी है बसों में पैर रखने की जगह नहीं है जाये तो कैसे जाये फिर भी रामखिलावन के पाँव नहीं रुके ,रुके तो प्रयाग में ही जा कर । लाखो क्या करोडो लोगो के साथ वे भी गुम गए अपनी कछनी संभाले जो की बीच बीच में दगा देने की स्थिति में आ जाती थी खैर ,राम खिलावन कुम्भ का पुन्य लूटने को आतुर चले आये ।
भिडम भाड़ ,एक दुसरे को लोग  कचरे जा रहे है पर बढे  जा रहे है पुन्य लूटने  के चक्कर में कुछ लोग पहले ही  लुट चुके है लुटे लुटाये लोग अपनी अलग पंक्ति बनाये  हाथ जोड़े एक दरोगा के सामने कुछ फरियाद करने की मुद्रा में भयभीत से खड़े है ,दरोगा  के चक्कर में  सारे  मंत्र ,तंत्र भूल भाल गए है  बस दरोगा कृपानिधान से लग रहे है   जो अपने हाथ में लिए डंडे को चक्र सुदर्शन सा घुमा रहे है , भोले भाले  भगवान  के भोले भाले  भक्त सन्निपात  से ग्रसित दिख रहे है  ,एफ आई आर लिखने की नही बन रही थी सो नाम पता लिख लूटे लुटाये भक्तो को एक एक कर किनारे कर दिया गया जाओ भईया अब अगले कुम्भ में न दिखाना ,पुन्य कमाने के चक्कर में ये सभी शुन्य हो गए थे ,रामखिलावन धन्य हो गए प्रभु की महिमा देख कर ,लोग पभु की महिमा भर देख पाते है जीवन भर पर प्रभु को नहीं देख पाते , बलभद्र कहते है दादा हम जब जादू  देखते है तो जादूगर को भी देख पाते  है पर प्रभु की माया तो देखते है लेकिन  प्रभु को क्यों नहीं .....इस  यक्ष प्रश्न ने  रामखिलावन को धर दबोचा और वे धरे रह गए का बोलते ,इस पाखण्डी संसार में जहा खंड खंड पाखंड है और हम सब भी उसी में रचे बसे है क्या कहे और क्या करे कुम्भ में भी वही सब हो रहा है जो इस संसार में हो रहा है ,कुम्भ संसार से बाहर नहीं है और न ही सन्यासी ,यहाँ भी वही छल प्रपंच है जो संसार में व्याप्त है एक एक से बढ़ कर आये है छलिया तरह तरह के नट है शठ है लूट  है लुटेरे है राम नाम की लूट  है लूट सके तो लूट अंत काल  पछतायेगा जब प्राण जायेंगे छूट  ...........

Tuesday, February 12, 2013

विकास की गंगा ,रामखिलावन , भागीरथ की तरह लाना और  बहाना चाहते थे पर वो  थी कि सीधी सीधी  बहने को तैयार नहीं थी ,टेढ़ी मेढ़ी जितना चाहो बहा लो ,बलभद्र ने भी बताया कि दादा गंगा को देखो न कहा सीधी सीधी बहती है वह भी तो टेढ़ी मेढ़ी बहती है तुम लगे हो नाहक पसीना बहाने में जब गंगा टेढ़ी मेढ़ी बहती है तो विकास भी टेढ़ा मेढ़ा  होगा यह बात राम खिलावन के मन में घुस गयी और वे शांत हो गये इस देश में हर चीज टेढ़ी मेढ़ी ही होगी ।
तभी तो विकाश भी सीधा सीधा नही होता ,कोई काम भी आज सीधे तरीके से नहीं होता चाहे राशन कार्ड बनवाना हो या वोटर लिस्ट में नाम लिखना हो स्कुल में एडमिशन हो या गैस की टंकी लेनी हो ,इस देश में तिकड़म अनिवार्यता है दस प्रश्नों में पांच  प्रश्न करने है किन्तु प्रथम प्रश्न अनिवार्य है साफ सफाई के दो अंक प्रथक से मिलेगे ,ऐसा ही है सब कुछ ऐसे नेक विचार से बलभद्र ने अपने स्वयं - भू देव राम खिलावन को बताया , जिससे रामखिलावन हद्प्रद  हो गये ।
रामखिलावन हदप्रद  थे पर बलभद्र सोच रहे थे कि वे गदगद है उसकी बात सुन कर पर रामखिलावन की कुछ कुछ गंभीर मुद्रा देख बालक बलभद्र मासूम हो गए कुछ देर माहोल शांत ही बना रहा और आगे भी बना रहता लेकिन एक कनखजूरे ने सारे माहौल को बरबाद कर दिया ससुरा रामखिलावन की कछनी में घुसा जा रहा था ,ये तो भला हो कि संत ने अपनी समाधी तोड़ी नहीं तो ...पता नहीं क्या क्या टूटता ।
टुटा तो रामखिलावन का मन है इस विकास को देख कर ,टूटे मन को लिए वे देश में भटक रहे है उन्हें अपना देश ही परदेश सा दिखने लगा है ,अपनों के बीच ही पराये से हो गए है लोग बाग  है कि प्यास बुझने  के बाद कुए की तरफ पीठ कर लेते है ,नदी पार कर लेने के बाद कौन नाव को लिए शहर- शहर घुमाता है .................. 
 

Monday, February 11, 2013

ramkhilvn


साल भर , रामखिलावन नदारत रहे ,कहा रहे गोपनीय है , शायद उन्हें खुद ही नही मालूम की वो कहा रहे ,भटकते रहे जैसे सब भटक रहे है कोई भक्ति में कोई शक्ति में । इस बीच उन्होंने खुरदुरी दाड़ी  जरुर बढ़ा  ली है जिसे वो कभी कभी यु ही खजुआ लेते है ,बलभद्र का सोचना दूसरा है वो कहता है शायद जुए पड़े हो ,बेहरहाल खजुआने के बाद वो सकून महसूस करते देखे गए है ऐसे जैसे किसी राष्ट्रीय समस्या का निदान हो गया हो ।
 बहुत दिनों बाद गांव पहुचने से उनकी आव भगत भी काफी हो रही है , भीड़ में किसी गुलछर्रे ने पीछे से उनकी कछनी खोलने का प्रयास किया पर सफल नही हो सका बलभद्र ने धर- धमका दो लाते अलग से दी , ससुरे जीने नही देगे , पता चला घुनघुटी था ,रामबहोर का लौड़ा ...बस यही रह गया है खुलने खुलाने का खेल इस देश में ,संसद से ले कर गांव गलियों तक इसी में व्यस्त है सब ,विकास हो रहा है सुनहरा विकास चौतरफा विकास पर उसमे हम कही नजर नहीं आते ।
विकास एक प्रक्रिया है जो धीरे धीरे होती है कभी कभी तेजी से भी विकास हो जाता है जैसे कुछ रेले पैसेन्जर होती है और कुछ मेल ,सुपर फ़ास्ट ,दुरानातो जो हर जगह नहीं रूकती निर्धारित जगहों पर ही रूकती है इसी तरह विकास भी वही वही   बहुत तेज होता है और ज्यादा तर  जगहों पर  पैसंजर की तरह कही कही तो बिलकुल भी नहीं होता ,विकास के लिए पटरी होना ,पटरी खाना अनिवार्यता है पटरी नहीं बैठी तो विकास कहा से होगा ससुरो इत्ती  सी बात समझ में आती नहीं ,चले विकास करने , तालाब खुदा नहीं की हो गए नंगे नहाने के लिए ।
देश कोई रबर का छल्ला तो है नहीं कि  खीचा और विकास हो गया विकास की नीतिया होती है नियम कानूनों से विकास होता है ,विकास राम निहोर का नाती नहीं  और न ही राम दुलारी की बिटिया क़ि ,पूनम 
के चाँद की तरह विकसित हो जाये । 
 राम खिलावन पिछले सालो में देश के विकास को ले कर चिंतित है चिंता में डूबे है अभी अभी उतराए है सो चल दिए अपने गांव की तरफ और यहाँ है कि गांव के लुच्चे उनकी कछनी खोलने में उतारू है कैसे हो विकास और  किसका हो किसका न हो ये सब बाते रामखिलावन के मन में गोता  खा रही है  उन्होंने बलभद्र को लिया और अमराई की तरफ निकल गये .......

Monday, May 14, 2012

 राम राम 

Tuesday, February 15, 2011

सोंधी सोंधी सी यादे ............

कैसे थे वे दिन मुए और कैसी थी वे रात
जाने भी अनजाने लगे तन मन देत सुहात
बादल कहा से आये थे और कहा पे जा बरसे
कुछ भी तो नही सूझता बस हम तो बस तरसे
आखोँ की भाषा पठे अखियाँ रुक रुक कर
गरदन भी उठती रही आखिर झुकझुक कर
सोंधी सोंधी सी यादे मन में परत फुहार
क्या फिर से मिल पाएंगे जीवन में एक बार

Monday, February 14, 2011

बुलबुल ने दम तोडा ..........

बुलबुल ने दम तोडा , बुल ने किया उपास
कंकरीट के जंगलो तुमने किया उदास
तोता -मैना जा उड़े , अब जाने कहा पे बैठे
बलिहारी शहरी करन ,जो गांव के आंगे ऐठे
आती -जाती थी रही , गौरईया सोनचिरैया
अब तो ठुठे पेड जिनमे लगती नही बरैया
कौवा आता था लिए , मेहमानों का सन्देश
अब तो खुद ही भटक रहे देश हुआ परदेश

Wednesday, February 2, 2011

कहा है अपनापन ........

खूब गौरईया बैठती , थे आँगन और मुडेर
अब बलिहारी खिड़किया ,जो खुलती है कुछ देर
रातो में तारे गिने , और खूब बुने सपने
खाली के खाली रहे , कोई भये न अपने
रात बियारी में रहा ,घी का सोंधापन
कहा गया वो बचपना कहा है अपनापन

जीवन भर हारे जीवन से .......

जीवन भर हारे जीवन से
जी न पाए तन -मन से
सांसो का ये हीरामन
कब कहा उड़ा ले जायेगा
बाहर की आखे खुली हुयी
भीतर की मुदरी मुंदी हुयी
सुख दुःख के इस धुप छाव में
चल -चल जीवन थक जायेगा
मिल -जुल कर हम नही रहे
बाहर ही बाहर जुड़े रहे
भीतर का कोहराम लिए
सत्य राम नाम हो जायेगा
गाजे बाजे बाजेंगे
डोली चढ़ कर जांएगे
रोज -रोज का अस्त -उदय
सब यही धरा रह जायेगा

मन भर जीवन ........

रोज रोज का जीना -मरना
रोज-रोज का अस्त उदय
क्या तुमको क्या मुझे मिला है
जीवन के इस वन में जी कर
ऊंगली भर थे बचपन के दिन
दियासलाई सा था यौवन
उमर गुजारी पल -पल हमने
जीवन के इस वन में जी कर
मन भर जीवन जी न पाए
तन भर ढके रहे जीवन भर
अधियारे में जिनको देखा
उजियारे पहचान न पाए
कही पुजारी पूजा बेचे
कही मौलवी मौलापन
नही मिला फिर कही देखने
बचपन का वो भोलापन
जीवन भर जी कर भी हम -तुम
मिल न पाए अपने से
क्या मुझको क्या तुम्हे मिला है
जीवन के इस वन में जी कर ........

Monday, January 31, 2011

जमीनी हकीकत

राम खिलावन और बलभद्र अपनी चिर परिचित मुद्रा में बैठे बतिया रहे थे सामने ताजा-ताजा अखबार फैला हुआ था जिसे रामखिलावन दादा ने हेड लाइन से ले कर अंतिम पृष्ठ तक पठ चुके थे अब वे उसे बोख्बा बारी को देने वाले थे जिसे वे रोज की तरह आवश्कतानुसार अपनी भट्टी को समर्पित करते
गांव के विद्वान ,मनीषी ,उजबक जब सब दीन दुनिया की खबरों से रूबरू हो जाते तो फिर भला अखबार का और क्या काम वो बोखाबा बारी के हाथो अपने आप को अग्नि में समाहित कर स्वाहा स्वाहा हो जाता
अखबार में एक खबर गर्म थी सो उसी को ले कर रामखिलावन बतिया रहे थे ,दूर गांव के एक किसान ने कामधेनु योजना के अंतर्गत अपने खेत में कुआ खुदवाया था सरकारी योजना के तहत एक साल में ही कुए की जुड़ाई सरक गयी सरकार की तरह धस अलग गया ,किसान ने इसकी शिकायत जिले के कलेक्टर से की सो सरपंच पर बन आई ,सरपंच ने किसान की ऐसी तैसी कर दी बेटा कुआ खुदवाया उसमे पानी भी निकला दीवार धस गयी तो मेरी शिकायत कर आये अब बेटा पियो पानी गांव में तो जाने अब ससुरे तुम्हारा पानी न निकला तो कहना बेचारा किसान गांव छोड़ राजधानी में दस दिन से दल बल सहित डेरा डाले है मुख्य मंत्री से मिलने उन्ही से कहेगा सब कुछ और वो है कि मिल नही पा रहे है वो मिले भी तो कैसे प्रदेश के विकास में दिन रात एक किये है
विकास की दर प्रदेश में क्या देश में बठ रही है रामखिलावन बोले भैया विकास दर बठ रही है कि विनाश दर ..............

Friday, January 21, 2011

ऊट के मुह में जीरा .......

अन्नदाता ,हलाकान है ,फसले पाले में पट गयी किसान ठनठन गोपाल जो जमा पूजी थी सब स्वाहा अब उसकी बारी है सरकार मुआवजा बात रही है ,जले में नमक छिडक रही है या नमक में जल रामखिलावन भी बैठे बैठे सोच रहे है कि जब अन्नदाता ही भूखा रहेगा तो दूसरों का क्या होगा , दूसरे मजे में कब तक रहेंगे ,बलभद्र कह रहे है मौजा ही मौजा ,उनका जो मुआवजा बाट रहे है ,सर्वे कर ,करा रहे है हो क्या रहा है अपने ही देश में बेगानों जैसा वर्ताव सोच सोच कर अन्नदाता ,दे दाता के नाम तुझको अल्ला रखे गुनगुनाने लगा है एक किसान ने तो सर्कार द्वारा दी जाने वाली मुआवजे की राशी इस लिए लौटा दी कि भैया इसे आप ही रखो , इससे ज्यादा तो खेत से पाला खायी फसल को हटाने में ही लग जायेगा
किसानो के देश में किसानो की यह दुर्दशा ,क्या बात है ,हमारे देश की आत्मा गावो में बसती है ,यही कहते है हम सभी और उस आत्मा को मारे डालने में कोई कसर नही छोड़ रहे है छोड़े भी क्यों , आत्मा तो हम सब ने अपनी अपनी पहले ही मार डाली है फिर देश की आत्मा की क्या चिन्ता और फिर चिन्ता करने से तो चतुराई घटती है ,भला हम क्यों अपनी चतुराई घटाने चले ,और रहा दुःख सो भैया बहादुर दुःख से शरीर घटता है सो उससे भी राम राम , हम तो दूसरों का शरीर घटाने में लगे है ,भला अपना क्यों घटाए दुःख करके
अन्नदाता दुखी है तो अपने ठेंगे से ,इस देश में लोग दूसरों का सुख देख कर भी तो दुखी होते रहते है
और दूसरे के दुःख को देख कर सुखी होते है अपनी बला से , न्यायाधीशों के यह लम्बित प्रकरणों का अम्बार लगा हुआ है और हम है कि न्यायाधीश बने टीका करते नही चुकते प्रकरण चाहे कोई हो किसी के बारे में हो सार्वजनिक हो या व्यक्तिगत हम सब में टाँगे अड़ाए ये हमारा दायित्व है

Wednesday, January 19, 2011

बहुत दिन बाद ........

राम खिलावन बहुत दिन बाद फिर आ गए ,मन भर गया इस चिल -पो से उनका ,बेसुरा गाना सब गए जा रहे है हर तरफ भ्रस्ताचार की बाते उसी के गीत उसी के नव गीत गाते लोग बैग नही अघा रहे है लितनी बाते करते है उतना ही वह सुरसा की तरह बठ्ता ही जा रहा है शायद गाने न गाने से न बठे ऐसा रामखिलावन का सोचना है ,वो कहते है की गए गए बियाह हो जाता है बलभद्र ,भ्रस्ताचार क्या चीज है जिसके बारे में हम सब ज्यादा सोचते है वही हमे सब तरफ दिखने लगती है ,प्रेम के किसी दीवाने से पुछो भईया उसे हर तरफ उसकी प्रेमिका ही दिखाई देती है हर जगह वह उसी की छवि देखता है उसी में सोता है और उसी में जागता है ,ऐसी ही कहानी कुछ -कुछ भ्रस्ताचार की है

तुम्हारा का कहना है बलभद्र महोदय , रामखिलावन खीस निपोरते हुए उनकी तरफ व्यंग बान मारते हुए बोले _ कुछ सकुचाते हुए भईया बलभद्र उवाचे ,दादा -जैसे हमारे विचार होते है वैसे ही हमारे आचार होते है जो आगे चल क्र अपनी प्रकृति के अनुसार सदाचार ,भ्रस्ताचार ,शिष्टाचार ,के नाम से जाना जाता है दादा समाज तो सामाजिक प्राणियों से मिल कर बनता है तो फिर यह असमाजिक चीज सामाजिक जगह कैसे घुस गयी शरणार्थियों की तरह ,लगता है इसमें भी कुछ विदेशी शक्तियों का हाथ है जैसे सब चीजों में प्रायः होता है या कहा जाता है ,हमारा देश तो महान है इस देश के नागरिक भी महान है ये गैर महान चीज कहा से पिल पड़ी निकल बाहर करो ससुरे को ,जाये जहा से आया है
कौन कहा से आया है और कौन किसे भागना चाहता है सब कुछ कल के गाल में समाया है पर हम बपुरे तो इसी चिल पो में पिसे जा रहे है

Tuesday, August 31, 2010

बादल आये गांव में .........

बादल आये गांव में , हुई खूब बरसात
दिन तो सारा भीग गया भीगी सारी रात
नीम निबौरी खिल उठे ऐसी थी सौगात
छानी छपर चूने लगे जह तह रखी परात
पोखर डबरे भर गये नदियां में थी बाढ़
छप छप करते आये ओढ़े शाल असाढ़
फुहारे जो रिमझिम रही बनी थी वो घनघोर
दिन भर बरसी सांझ हुई फिर होने को भोर
छाता ले मुनिया चली छप छप करते पांव
सारी धूल से धुल गया वो पुरखो वाला गांव
रात ओसारी में कटी दिन में पहुचे खेत
भिनसारे की ओठनी रही ओउघायी लेत






Tuesday, August 24, 2010

जीरो बटा सन्नाटा......

मनौतियो और मान्यताओ को ,लादे शनिचर जीवन भर चले पर भाग ना पंहुचा लधे शुन्य न कुछ ले के आये थे न कुछ ले के जायेंगे उनके मन में यह विचार आता है की ससुरे जीवन भर घास छिलते रहे का बड़े असमंजस में है चलती बेरिया करे तो करे का जो सुना -सुनाया, सुना ,उन्होंने जीवन भर ,सो किया अब उम्र जब, चला चली की हो चली तो लगे है हिसाब किताब करने , पर बार -बार करने पर भी उनका हिसाब किताब सब गड्डम- गुड्डा हो जाता है पिसाब जरुर निकल आता है इस मेहनत पर सो अलग समस्या है ..ससुरी बार बार जोडने घटाने के बाद भी हिसाब लध्धे शुन पर जा टिकता है शनिचर कनफुजिया गए है शनिचर हलकान है किससे चलती बेरिया पूछे पाछे बाल सखा जो रहे ससुरे पहले ही निपुर-निपुरा गए है जो एक दो बचे है कौनो काम के नही ,बिशेषर है कान का पर्दा फाड़े बैठे है साल भर से लौंडे है , उनके तीन धोऊ चार पर काहे को सुने कि बुठापे में कुछ सुभीता दे दे बाप को कहते है की बुठाईदार सुन सुना के का करेंगे कक्कू जीवन भर तो सुने नही किसी की अब जरा विश्राम कर ले हम सोच रहे है काहे को जाते जवाते राडी दुखाई सुने, यही सुभीता का कम है बताओ .....
शनिचर कहते है मान्यता , मतलब कुछ ऐसा झालाम्झाला ,धारणाये और अनुमान , कुछ ऐसी बाते जिनका सर पैर न हो पर जिस पर मन विश्वास करता है लेकिन जो सच न हो ,सच लगती भर हो क्योकि आस पास के सभी जन उन बातों पर विश्वास करते है सो देखा देखी हम भी करने लगते है मान्यता का अर्थ ही है जो नही है लेकिन हम सब मान लिए है मान्यता चोरकट है जाली है जो अज्ञान के अधेरे में चलता है ज्ञान के प्रकाश में नही
शनिचर ने इस चक्कर में जीवन भर भूले की अब चलाचली की बेला में हिसाब किताब सब गड्ड -मड्ड स्वर्ग नर्क की मान्यता जिसकी कोई भौगोलिक स्थिती नही है ,इस जन्म का फल अगले जन्म में मिलेगा ,सुख केवल अमीरो की बपौती है ,पैसा किस्मत से मिलता है ,पूजा न करेंगे तो भगवन नाराज हो जायेंगे फिर ले लेना बेट्टा सरस्वती जी घर घर पूजी जाती है पर नोबल पुरुस्कार पश्चमी देशो के नाम ,घर घर लक्ष्मी जी विराज मान है पर वो महरानी पाव तोड़ के अमरीका में बैठी है ....हम हिंदू ,मुसलमान सिख ,ईसाई की लड़ाई ही लड़ते रहे जीवन भर का मिला भैया .....
मूल मान्यता हम अपने आप को जीवन भर शरीर समझे रहे ,यह मेरा शरीर है ,यानी मै इससे अलग हुआ जब हमारे कपडे फट जाते है तब हम यह नही कहते की हम फट गए है लेकिन शरीर में दर्द होते ही कहते है दर्द हुआ यह है मूल मान्यता हम कपडे नही ,कपडे का उपयोग करने वाले है हम शरीर नही शरीर को चलाने वाले वाहक है ऐसी कुछ कुछ बाते शनिचर के मन में उपद्रव किये हुए है ,का करे किससे कहे और का कहे कोई इस भीड़ में सुनता नही दिखाई देता सब लगे है जीने में ,जीवन क्या है ,जीना क्या है वो ही जाने ...........शनिचर तो कहते है सब हिसाब किताब जीरो बट्टा सन्नाटा है भैया ..............

Saturday, August 21, 2010

तारो की बरतो वाला गांव

तारो की बारातों वाला गाँव ,यादो की बारातों वाला गाँव
नानी की कहानी वाला गाँव, काका के ककहरा वाला गाँव
नीम की निबौनी वाला गाँव, आँगन ओ ओसारी वाला गाँव
कीचड़ ओ कांदो वाला गाँव, नदियां में नावों वाला गाँव
महुआ ओ आमो वाला गाँव, खेत ओ खलिहानो वाला गाँव
पूजा ओ परछन वाला गाँव, तीज ओ त्योहारों वाला गाँव
मेल ओ मनुहारो वाला गाँव, छंद ओ मकरंद वाला गाँव
हँसी ओ ठिठौली वाला गाँव, झगडे ओ झासें वाला गाँव
पंच ओ परपंचो वाला गाँव, नेग ओ विदाई वाला गाँव
चौपड ओ चौपाल वाला गाँव, पान ओ पतौखी वाला गाँव
नन्द ओ भौजाई वाला गाँव, दिया ओ बाती वाला गाँव
ज्योनार ओ बियारी वाला गाँव, मस्ती ओ हुडदंग वाला गाँव
आदर ओ सम्मान वाला गाँव, नेह ओ स्नेह वाला गाँव
दुःख ओ सुख वाला गाँव, शेर ओ शियार वाला गाँव
भाजी ओ बरी वाला गाँव, बगिया ओ चिरईया वाला गाँव
बेला ओ करौदो वाला गाँव, ताल ओ तलईया वाला गाँव
नइहर ओ पीहर वाला गाँव ,मेध ओ बदरी वाला गाँव
धूल ओ पगडंडी वाला गाँव ,धूप ओ जाड़े वाला गाँव
साँझ ओ भिनसारे वाला गाँव, चाँद ओ सूरज वाला गाँव
तारो की बरतो वाला गाँव , बोलता प्रतीकों वाला गाँव

तारो की बारातों वाला गांव.......

तारो की बारातों वाला गाँव

यादो की बारातों वाला