
Tuesday, June 16, 2009
राम खिलावन हाजिर है

राम खिलावन सरकार को सरकते हुए देख रहे थे ,सरकते सरकते सरकार ,बेकरार हो गई थी ,राम खिलावन का चिंतन था की सरकार , बेकरार नही बेकार हो गई थी , बेकरार हो कर सरकार कुछ कदम उठाना चाह रही थी ,लेकिन उठा नही पा रही थी ,कोई कह रहा था की ,लकवा लग गया है ,राम खिलावन कह रहे थे की बहुत दिनों तक जिस अंग का उपयोग नही करोगे ,तो क्या होगा , यही होगा बलभद्र जो पास ही ताजे अखबार की सुर्खियों से ले कर ,सब कुछ पठने में तलीन थे अचानक बोल पड़े वही होगा जो मंजूरे खुदा होगा राम खिलावन बिफर पड़े ,ये क्या बात हुई ,जो सरकार को मंजूर होगा वह क्या नही होगा ? काहे को होगा ,बलभद्र बोले ,राम खिलावन से रहा नही गया ,बोले ,क्यो बे क्यो नही होगा ?
काकू तुम भी न ,कभी कभी जान के भी अनजान बने रहते हो ,हा ,हा बोलो बोलो क्या बोलना चाह रहे हो बे ,
काकू क्या तुम्हे मालूम है की खुदा की क्या मर्जी है ,जो हो जाता है वही तुम खुदा की मर्जी समझ लेते हो ,और कहते हो की यही खुदा की मर्जी है ,खुदा की मर्जी के आगे किसकी क्या चली है ,बोलो यही कहते हो ना हा बे यही कहता हु आगे बोल, राम खिलावन अपनी भ्रगुती तानते हुए बोले , काकू सुनो _क्या सरकार भ्रस्ताचार फैलाना चाहती है ?बलभद्र अपनी कछनी को एक विशेस दिशा की और घुमाते हुए बोले
राम खिलावन बोले _नही तो और हमने सुना भी नही की सरकार की कोई मनसा है ,तो फ़िर काहे बगरा है चारो और बिना सरकार की कोई योजना के ?,यह मान लिया जाए की सरकार की योजना के बिना भी बहुत सी योजनाये चलती रहती है क्या ? राम खिलावन भौचके से बोलते और सुनते रहे और यह भी सोच रहे थे की बलभद्र को ये कैसी बाते सूझने लगी है ये तो फिलासफर जैसी बाते करता है साला
बलभद्र बोले काकू ,सुनो जब खुदा की मर्जी के बिना कोई पत्ता नही हिलता तो बिना सरकार के मर्जी के कुछ हिल सकता है कोई योजना चल सकती है क्या तुम्ही बताओ
तो क्या यह मान लिया जाए की खुदा की और सरकार की मर्जी एक है और दोनों मिले हुए है और हम खुदा के बन्दे यहाँ अपनी.....................
कुल मिला , कर धक्का खाए गाजी मिया , मजा मारे मुजफ्फर
यही राम खिलावन का चिंतन उभर कर bahar आया
खैर जो हो,सो हो ,राम खिलावन आज बलभद्र की bato से avibhut हो चले थे और सोच रहे थे की बलभद्र को अपनी gaing में samil कर कुछ बुरा नही किया है बलभद्र के ये krantikari विचार सुन कर राम खिलावन की pulli thhili हो गई थी चिंतन कर रहे थे की क्या बलभद्र सही कह रहा था की दोनों मिले हुए है ,कुछ न कुछ तो है
और ये कुछ को तो राम खिलावन
pahale से ही talash रहे है ,मिला नही ये अलग बात है
राम खिलावन का चिंतन jari है ,बलभद्र अपनी
saykil में sawar हो दूर निकल गए थे कुछ ये gungunaate हुए ...........
ये malik तेरे बन्दे हम ..............
ease हो हमारे करम ......................................
Sunday, June 14, 2009
राम खिलावन हाजिर है
राम खिलावन यत्र ,तत्र ,सर्वत्र हाजिर है देखे आज कही आपके पास तो नही पहुच गए
कही वे आकार लिए होते है तो , कही निराकार ,आकार से तो आप उन्हें पहचान लेगे यदि आखे हुई ,बटन नही ,पर निराकार होने ,पर कैसे पहचान पायेगे ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की आप तो आकार लिए हो पर क्या अपने आप को पहचान पाए हो की हमें ही पहचान पाओगे ?
हम सब बाहर की दुनिया में जीते है अन्दर की दुनिया में जाने में नानी याद आती है ,
राम खिलावन कहते है
बाहर कंकर ,पत्थर ओ ,अन्दर गौरी शंकर
ये उसने कही सुन रखा था सो सब को यही बताया करता था ,
उसकी इन बातो को ज्यादातर लोग अनसुना कर देते है जैसे आप कर रहे है
कुल मिला कर राम खिलावन अन्दर का मॉल बाहर ही तो करने को कह रहे है पर कौन करता है अन्दर का मॉल बाहर , सब बाहर का मॉल अन्दर करने में लगे है ,आप की क्या राय है ,अपने बारे में ,दूसरे के बारे में न कहे तो बेहतर होगा ,पहले अपने आप से पूछ ले ,अपने आप को जान ले ,फ़िर दुसरे के बारे में जाने
राम खिलावन अपने को जानता है दूसरो को जानने की कोशिश भी नही करता क्यो करे ,जान कर करेगा भी क्या? ,आचार डालने के लायक भी तो नही hai koi
बलभद्र कहता है वो सब को जानता है ,अपने को छोड़ कर ,
ये अलग बात है की उसे कोई नही जानता
हम राम को, बलराम को ,जानते है खुदा की खुदाई को भी जानते है ,
पर अपने आप को क्यो जानने की कोशिश नही करते ?
शायद किसी ने रोका है आपको ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की किसी ने नही आप ने ख़ुद अपने आप को रोक रखा है
बाहर आनंद है तो अन्दर , परमानद है
राम खिलावन ,मोलश्री के पेड़ के नीचे बैठे',चिंतन कर ही रहे थे की ,बलभद्र प्रशाद ,अपनी कछनी संभालते संभालते पहुच ही गए ,
रामखिलावन बोले ऐचेकताना ,कहा से सवारी आ रही है ?
का बताई ,कहा से आ रहे है ,
सोसायटी गए रहे की कुछ राशन ले आवे ,
तो का हुआ,
राशन सब ख़तम और का ,चले आए मुह लटकाए ,पता नही कोउन लईगा हमारे नाम का राशन?
बोखवा sudama bhi vahi baitha raha ham to chale aaye par wo abhi bhi baitha hai
intjar me
किसके इंतजार में ? रामखिलावन ने पूछा
सोसायटी के बाबू के और किसके ,
अच्छा अच्छा ,हम सोच रहे थे की वहा अफशर ही अफशर होते है खैर ,खुदा खैर करे ,सुदामा का
बलभद्र ,पास ही पड़े ताजे अखवार के समाचार पठने लगे
मुनाफाखोरों को बक्सा नही जाएगा ,बक्सों में बंद कर दिया जायेगा ,सुनो ,सुनों ,सुनो ,
आज की ताजा ख़बर सुनो
और कब खोला जाएगा यह सरकार तय करेगी सुनों ,सुनों ,सुनों
आज की ताजा ख़बर सुनों
रामखिलावन का ताज़ी ख़बर पर चिंतन जारी है ,
ये अलग बात है की उनके बाप रोज ताज़ी ख़बर ही पढ़ते थे ,जो दूसरे दिन बासी हो जाती थी और फ़िर वो भूल जाते थे की कल क्या ख़बर थी ,क्यो की वे वर्त्तमान में जीते थे और रामखिलावन भी अपने बाप की तरह वर्तमान को ही जीता है ,बासी बातो,खयालातो को राम खिलावन लात मारता है
बिल्कुल अपने बाप की तरह
रामखिलावन गुनगुना रहे है लागा चुनरी में दाग छिपाऊ कैसे ,घर जाऊ कैसे ,लागा चुनरी में दाग ............
कही वे आकार लिए होते है तो , कही निराकार ,आकार से तो आप उन्हें पहचान लेगे यदि आखे हुई ,बटन नही ,पर निराकार होने ,पर कैसे पहचान पायेगे ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की आप तो आकार लिए हो पर क्या अपने आप को पहचान पाए हो की हमें ही पहचान पाओगे ?
हम सब बाहर की दुनिया में जीते है अन्दर की दुनिया में जाने में नानी याद आती है ,
राम खिलावन कहते है
बाहर कंकर ,पत्थर ओ ,अन्दर गौरी शंकर
ये उसने कही सुन रखा था सो सब को यही बताया करता था ,
उसकी इन बातो को ज्यादातर लोग अनसुना कर देते है जैसे आप कर रहे है
कुल मिला कर राम खिलावन अन्दर का मॉल बाहर ही तो करने को कह रहे है पर कौन करता है अन्दर का मॉल बाहर , सब बाहर का मॉल अन्दर करने में लगे है ,आप की क्या राय है ,अपने बारे में ,दूसरे के बारे में न कहे तो बेहतर होगा ,पहले अपने आप से पूछ ले ,अपने आप को जान ले ,फ़िर दुसरे के बारे में जाने
राम खिलावन अपने को जानता है दूसरो को जानने की कोशिश भी नही करता क्यो करे ,जान कर करेगा भी क्या? ,आचार डालने के लायक भी तो नही hai koi
बलभद्र कहता है वो सब को जानता है ,अपने को छोड़ कर ,
ये अलग बात है की उसे कोई नही जानता
हम राम को, बलराम को ,जानते है खुदा की खुदाई को भी जानते है ,
पर अपने आप को क्यो जानने की कोशिश नही करते ?
शायद किसी ने रोका है आपको ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की किसी ने नही आप ने ख़ुद अपने आप को रोक रखा है
बाहर आनंद है तो अन्दर , परमानद है
राम खिलावन ,मोलश्री के पेड़ के नीचे बैठे',चिंतन कर ही रहे थे की ,बलभद्र प्रशाद ,अपनी कछनी संभालते संभालते पहुच ही गए ,
रामखिलावन बोले ऐचेकताना ,कहा से सवारी आ रही है ?
का बताई ,कहा से आ रहे है ,
सोसायटी गए रहे की कुछ राशन ले आवे ,
तो का हुआ,
राशन सब ख़तम और का ,चले आए मुह लटकाए ,पता नही कोउन लईगा हमारे नाम का राशन?
बोखवा sudama bhi vahi baitha raha ham to chale aaye par wo abhi bhi baitha hai
intjar me
किसके इंतजार में ? रामखिलावन ने पूछा
सोसायटी के बाबू के और किसके ,
अच्छा अच्छा ,हम सोच रहे थे की वहा अफशर ही अफशर होते है खैर ,खुदा खैर करे ,सुदामा का
बलभद्र ,पास ही पड़े ताजे अखवार के समाचार पठने लगे
मुनाफाखोरों को बक्सा नही जाएगा ,बक्सों में बंद कर दिया जायेगा ,सुनो ,सुनों ,सुनो ,
आज की ताजा ख़बर सुनो
और कब खोला जाएगा यह सरकार तय करेगी सुनों ,सुनों ,सुनों
आज की ताजा ख़बर सुनों
रामखिलावन का ताज़ी ख़बर पर चिंतन जारी है ,
ये अलग बात है की उनके बाप रोज ताज़ी ख़बर ही पढ़ते थे ,जो दूसरे दिन बासी हो जाती थी और फ़िर वो भूल जाते थे की कल क्या ख़बर थी ,क्यो की वे वर्त्तमान में जीते थे और रामखिलावन भी अपने बाप की तरह वर्तमान को ही जीता है ,बासी बातो,खयालातो को राम खिलावन लात मारता है
बिल्कुल अपने बाप की तरह
रामखिलावन गुनगुना रहे है लागा चुनरी में दाग छिपाऊ कैसे ,घर जाऊ कैसे ,लागा चुनरी में दाग ............
हम है पखेरू बहुत दूर के
भारत भवन भोपाल , में सालो साल पहले पधारे ए़क कवि की कविता की कुछ पक्तिया ,
आपके लिए
प्रेम से तुम सुनो ,और
सुन कर गुनो,
मन मिलाओगे, तो मन से ,
जुड़ जायेगे ,
वरना हम है ,
पखेरू बहुत दूर के ,
बोलिया ,बोल अपनी ,
उड़ जायेगे
आपके लिए
प्रेम से तुम सुनो ,और
सुन कर गुनो,
मन मिलाओगे, तो मन से ,
जुड़ जायेगे ,
वरना हम है ,
पखेरू बहुत दूर के ,
बोलिया ,बोल अपनी ,
उड़ जायेगे
Saturday, June 13, 2009
राम खिलावन हाजिर है
राम खिलावन संत ,सनसनाते हुए आए और धम्म से ओसरी में धरे तखत में बैठ गए सोच रहे थे कहा फस गए ,माया ने तो पहले से फसा रखा है , और ,अब ये नया लफडा ,माया से बडा तो कोई लफडा है नही फ़िर ये फसना,फ़साना क्या ?
सब माया है ,
सब काया है
कही धूप कही छाया है,गुनगुनाते हुए रामखिलावन चिंतन में डूब गए
बलभद्र चुतियाई की बाते बहुत करता है ,कल कह रहा था,
रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे से फ़सी थी इसी लिए भागी थी ,कभी कुछ तो कभी कुछ कहता है ,उसकी समझ में तो कुछ आता नही ,ऊपर से हमें समझाने चला है
तभी बलभद्र ताबड़तोड़ सायकिल भगाते ओसारी से आ टकराए ब्रेक तो था नही यदि था भी तो लगते लगते लगता था ,तब तक जो होना होता था हो जाता था ,पिट पिटा जाते थे या छिल छुला जाते थे ,पर सायकिल का ब्रेक था की सुधरने की नाम नही लेता था जैसे बलभद्र ख़ुद सुधर नही रहे है और दुसरे को सुधारने में अपनी उर्जा तो उर्जा गुप्त उर्जा को भी लगाये पड़े है
राम खिलावन दस बार बता चुके है की बल्भदर बेटा उर्जा एक ही होती है सौ ,पचास नही होती है तुम्हारे भेजे में क्यो नही धसती है ये बात ,बता
बलभद्र ,को तो जो समझाना होता था वही समझते और जो नही समझाना होता था उसमे आय बाय करने लगते कुल मिला कर वो अपने मर्जी के गुलाम थे ,बिना मर्जी के कुछ नही करते थे और न ही कोई माई का लल्लू उनसे कुछ करा भी सकता था
रामखिलावन को इस बात का भी मलाल रहा करता है की फ़िर वो कुछ पूछता क्यो है जब उसे करना अपने मन का ही है क्यों मेरा समय जाया करता है ,मनमौजी लाल
फसने फ़साने की बात तो राम खिलावन को पसंद ही नही आई कभी ,उनका दर्शन बहुत स्प्रस्त्त था की माया से बडा कोई फंदा नही है जब उसमे फसे है तो फ़िर ये फसना फ़साना क्या मायने रखता है इस काया में रहते क्या कोई माया के फंदे को तोड़ पाया है रामखिलावन यह भी जानते है की माया बडी ठगनी है,
रामखिलावन ,ठगनी ,ठगने में भी विस्वास नही रखते है वो ठगे जाने में विस्वास रखते है कोई भी ठग ले ,खड़े है रामखिलावन ठगे जाने के लिए आओ और ठगों ,रामखिलावन कहते ,ठग कर करोगे kya ,rakhoge कहा ,कहा जाओगे ,वही जाओगे न jaha से आए हो ,भूल गए kafan में जेब नही होता ,तुमने yadad bana रखे हो ये बात अलग है , kisi ko batana mat nahi to pichhe पड़ जायेंगे तुम्हारे की मेरे kafan में भी bana दो ,जेब क्या करोगे ,फस जाओगे ,fasoge क्या फसे तो हो ही ,क्या कहने है ,आपके, जय हो जय हो
राम खिलावन ,इसी udhed bun में khoye हुए थे की बलभद्र की सायकिल ने unake चिंतन को जोर का jhataka दिया और वे jhatak कर बैठ गए क्यो बे, कहा से chidimaro की तरह आ रहे हो ?
kaku का बताये sunoge तो sunaau ,पंचायत का बड़ा baabu धर लिए गए है
रामखिलावन का चिंतन jari है माया है सब माया है कही धूप कही छाया है
सब माया है ,
सब काया है
कही धूप कही छाया है,गुनगुनाते हुए रामखिलावन चिंतन में डूब गए
बलभद्र चुतियाई की बाते बहुत करता है ,कल कह रहा था,
रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे से फ़सी थी इसी लिए भागी थी ,कभी कुछ तो कभी कुछ कहता है ,उसकी समझ में तो कुछ आता नही ,ऊपर से हमें समझाने चला है
तभी बलभद्र ताबड़तोड़ सायकिल भगाते ओसारी से आ टकराए ब्रेक तो था नही यदि था भी तो लगते लगते लगता था ,तब तक जो होना होता था हो जाता था ,पिट पिटा जाते थे या छिल छुला जाते थे ,पर सायकिल का ब्रेक था की सुधरने की नाम नही लेता था जैसे बलभद्र ख़ुद सुधर नही रहे है और दुसरे को सुधारने में अपनी उर्जा तो उर्जा गुप्त उर्जा को भी लगाये पड़े है
राम खिलावन दस बार बता चुके है की बल्भदर बेटा उर्जा एक ही होती है सौ ,पचास नही होती है तुम्हारे भेजे में क्यो नही धसती है ये बात ,बता
बलभद्र ,को तो जो समझाना होता था वही समझते और जो नही समझाना होता था उसमे आय बाय करने लगते कुल मिला कर वो अपने मर्जी के गुलाम थे ,बिना मर्जी के कुछ नही करते थे और न ही कोई माई का लल्लू उनसे कुछ करा भी सकता था
रामखिलावन को इस बात का भी मलाल रहा करता है की फ़िर वो कुछ पूछता क्यो है जब उसे करना अपने मन का ही है क्यों मेरा समय जाया करता है ,मनमौजी लाल
फसने फ़साने की बात तो राम खिलावन को पसंद ही नही आई कभी ,उनका दर्शन बहुत स्प्रस्त्त था की माया से बडा कोई फंदा नही है जब उसमे फसे है तो फ़िर ये फसना फ़साना क्या मायने रखता है इस काया में रहते क्या कोई माया के फंदे को तोड़ पाया है रामखिलावन यह भी जानते है की माया बडी ठगनी है,
रामखिलावन ,ठगनी ,ठगने में भी विस्वास नही रखते है वो ठगे जाने में विस्वास रखते है कोई भी ठग ले ,खड़े है रामखिलावन ठगे जाने के लिए आओ और ठगों ,रामखिलावन कहते ,ठग कर करोगे kya ,rakhoge कहा ,कहा जाओगे ,वही जाओगे न jaha से आए हो ,भूल गए kafan में जेब नही होता ,तुमने yadad bana रखे हो ये बात अलग है , kisi ko batana mat nahi to pichhe पड़ जायेंगे तुम्हारे की मेरे kafan में भी bana दो ,जेब क्या करोगे ,फस जाओगे ,fasoge क्या फसे तो हो ही ,क्या कहने है ,आपके, जय हो जय हो
राम खिलावन ,इसी udhed bun में khoye हुए थे की बलभद्र की सायकिल ने unake चिंतन को जोर का jhataka दिया और वे jhatak कर बैठ गए क्यो बे, कहा से chidimaro की तरह आ रहे हो ?
kaku का बताये sunoge तो sunaau ,पंचायत का बड़ा baabu धर लिए गए है
रामखिलावन का चिंतन jari है माया है सब माया है कही धूप कही छाया है
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