Monday, November 16, 2009

Thursday, November 12, 2009

शुभ हो


शुभ हो


Wednesday, November 11, 2009

शुभ हो

कल रात से पानी बरस रहा है ,कब तक बरसेगा किसी को कुछ पता नही ,फयाना तूफान निकल गया साइड पोज दे कर ,उसके इस पोज से लोग कयास लगाते रहे तरह तरह के कोई कुछ तो कोई कुछ बके जा रहा है जितने लोग उतनी दुनिया उतने मायने उतने सूरज उतने चाँद अपना ,अपना सच ,अपना अपना झूठ लिए लोग जी रहे है ये मानते हुए की वे हमेशा जीवित ही रहेंगे ,हमेशा जीवित रहने का मुकालता पाले लोग और उनके काम भी उसी तरह के भूल जाते है की उन्हें भी जाना है ,वापस घर ,लेकिन वे परदेश को ही घर समझ बैठे है ,समझ का फेर ही तो सब कुछ है जो जागते है वो समझते है ,जो सोते है वो .................
वर्तमान ही जीवन है एक जगह पठने को मिला जीवन और कुछ नही , बस घर लौटने की यात्रा मात्र है
आ अब लौट चले ...........
किसी कवि सम्मलेन में कवि की ये पक्तिया कितना कुछ कहती है ............
प्रेम से तुम सुनो
और सुन कर गुणों
मन मिलाओगे तो ,मन से जुड़ जायेंगे
वरना हम है पखेरू बहुत दूर के
बोलिया बोल अपनी उड़ जायेंगे
उड़ कर जायेंगे कहा ,घर ही आख़िर .................
घर वो जगह है जहा हम,आप ,सब बुरके उतार फेकते है ,पहुचते ही और अपने मूल स्वाभाव में आ जाते है ,बाहर हम कही कुछ तो कही कुछ बने ड्रामा करते रहते है अपने अपने रोल अदा करते ,जो रोल बेहतर करते है उनकी फ़िल्म सफल हो जाती है जो रोल बेहतर नही करते उनकी फ़िल्म असफल हो जाती है लेकिन लौटते दोनों है घर ,उसी घर में जहा से आए थे
कहा से आए थे और कहा घर है ,ये उन्ही को मालूम है जो मालूम करना चाहता है ,चाहने भर से कुछ नही होता ,चाहने को मूर्त रूप देना होता है और मूर्त रूप वाही दे पाते है जो पुरी तरह शत प्रतिशत चाहते है ,प्रशन बस प्रतिशत ,शत प्रतिशत का है
मन ,बेमन का है
मन मिलओंगे तो मन से मिल जायेंगे वरना हम है पखेरू
बहुत दूर के बोलिया बोल अपनी उड़ जायेंगे ..............................



भोर भई




Wednesday, November 4, 2009

भोर भई


भोर भई अब जाग मुशाफिर .......................


भोर कब होगी जीवन की ,जीवन भर क्या सोये सोये रहेंगे ,या फ़िर जागेंगे भी ? कब जागेंगे ,कुछ पल छिन आते है अनायाश जीवन में जो हमें ,तुम्हे जगाने की कोशिश करते है प्रयास करते है पल भर के लिए हम तुम जग भी जाते है ,पर फ़िर सो जाते है सोते सोते जीवन गुजार देते है जगे भी है तो केवल बाहर बाहर ,भीतर तो सोये ही रहते है कोई जगाये भी तो नही जागते


जीवन भर हम जागने का स्वांग किए भटकते रहते है ओरों को भी भटकाते रहते है अपने अपने दर्शन से प्रदर्शन से जीवन ऐसे जीते है की कभी मरेंगे ही नही दुसरे मरेंगे ,हम नही

हम जीने भर लिए अवतरित हुए है मरने के लिए नही

आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर ,कितनी बार सुना, सुन कर अनसुना किया ,और करते जा रहे है कब तक ,जब तक चले नही जायेंगे है ना? माया के मोह जाल का का बहाना लिए अपने को ख़ुद फ़साये घूम रहे है ,अरे तुम निकलने की कोशिश करो और ना निकल पाओ ये कैसे हो सकता है ,हम ख़ुद निकलना ही नही चाहते है जाल

janjaal से क्यो सही है ना ,और बहाना पर बहाना बनाये jate है

ये सब बहाने बह जायेंगे ,बह तो हम भी जायेंगे पर जब तक bahe नही है ,tab तक कुछ तो करे .......

gud खाए और gulgule से parhej करे ये bat कुछ jami नही

Wednesday, October 14, 2009

दिन फ़िर रहे है

राम खिलावन पिछले दिनों रावन मारने में बिजी रहे ,एन मोके में साला पानी बरस गया सो ससुरा जलने का नाम ही नही ले रहा था ,गिर अलग गया सो उठाए कौन ,राम लक्छ्मन और उनकी सेना सोफे में बैठी तमाशा देख रही थी , जनता जनार्दन ही ही कर हस रही थी अब क्या होगा लोगो ने दशहरा मैदान में लगी बल्लिया तोड़ तोड़ कर बरसते पानी में रावन को जलाने चल दिए और रावन था कि जलने का नाम नही ले रहा था राम खिलावन बोले जब ससुरा मरा नही तो जलेगा कैसे ? हर साल हम सब बंधू बांधव सहित रावन मारने का ड्रामा करते है और उसे जला जुलू कर ही सास लेते है मरा रावन अब सब ठीक हो जाएगा अत्याचार , व्यभिचार ,भ्रस्ताचार ,और भी जितने तरीके के चार अचार होते है ख़तम हो गए रावन के मरते ही ,जोर जोर से गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाते है सत्य कि जीत हुई और असत्य कि हार हुई
इन प्रतिको से हमने कुछ नही सीखा असत्य को हार साल मारते है फ़िर ससुरा कैसे जिन्दा हो जाता है मारते हो कि ड्रामा करते हो मारने का भइया राम खिलावन बोले
ये दुनिया ड्रामा ही तो है कुछ ड्रामा करके चले गए बाकि का ड्रामा हम कर रहे है अपना अपना रोल अदा कर रहे है ,हम तो झूठ मुठ का असत्य जलाते है हार साल सही सही का थोड़े ही अगर सही सही का जला देंगे तो अगले साल क्या जलायेगे ,अपने आप को क्या ?ये भी खूब रही ,राम खिलावन बोले
यही दस्तूर है दुनिया का ...................
हम कर क्या रहे है दूसरो को धोखा देते देते अपने आप को धोखा देना सीख लिया है हमने और अपने आप को बड़ा तीरंदाज समझते है
हम साठ साल के हो गए है सठिया गए है लगता है ,क्या थे क्या हो गए ,सुनहरे कल कि तरफ़ जाते हुए ,?
राम खिलावन सोच रहा है ड्रामा है सब------------- ड्रामा है