Monday, May 14, 2012

 राम राम 

Tuesday, February 15, 2011

सोंधी सोंधी सी यादे ............

कैसे थे वे दिन मुए और कैसी थी वे रात
जाने भी अनजाने लगे तन मन देत सुहात
बादल कहा से आये थे और कहा पे जा बरसे
कुछ भी तो नही सूझता बस हम तो बस तरसे
आखोँ की भाषा पठे अखियाँ रुक रुक कर
गरदन भी उठती रही आखिर झुकझुक कर
सोंधी सोंधी सी यादे मन में परत फुहार
क्या फिर से मिल पाएंगे जीवन में एक बार

Monday, February 14, 2011

बुलबुल ने दम तोडा ..........

बुलबुल ने दम तोडा , बुल ने किया उपास
कंकरीट के जंगलो तुमने किया उदास
तोता -मैना जा उड़े , अब जाने कहा पे बैठे
बलिहारी शहरी करन ,जो गांव के आंगे ऐठे
आती -जाती थी रही , गौरईया सोनचिरैया
अब तो ठुठे पेड जिनमे लगती नही बरैया
कौवा आता था लिए , मेहमानों का सन्देश
अब तो खुद ही भटक रहे देश हुआ परदेश

Wednesday, February 2, 2011

कहा है अपनापन ........

खूब गौरईया बैठती , थे आँगन और मुडेर
अब बलिहारी खिड़किया ,जो खुलती है कुछ देर
रातो में तारे गिने , और खूब बुने सपने
खाली के खाली रहे , कोई भये न अपने
रात बियारी में रहा ,घी का सोंधापन
कहा गया वो बचपना कहा है अपनापन

जीवन भर हारे जीवन से .......

जीवन भर हारे जीवन से
जी न पाए तन -मन से
सांसो का ये हीरामन
कब कहा उड़ा ले जायेगा
बाहर की आखे खुली हुयी
भीतर की मुदरी मुंदी हुयी
सुख दुःख के इस धुप छाव में
चल -चल जीवन थक जायेगा
मिल -जुल कर हम नही रहे
बाहर ही बाहर जुड़े रहे
भीतर का कोहराम लिए
सत्य राम नाम हो जायेगा
गाजे बाजे बाजेंगे
डोली चढ़ कर जांएगे
रोज -रोज का अस्त -उदय
सब यही धरा रह जायेगा

मन भर जीवन ........

रोज रोज का जीना -मरना
रोज-रोज का अस्त उदय
क्या तुमको क्या मुझे मिला है
जीवन के इस वन में जी कर
ऊंगली भर थे बचपन के दिन
दियासलाई सा था यौवन
उमर गुजारी पल -पल हमने
जीवन के इस वन में जी कर
मन भर जीवन जी न पाए
तन भर ढके रहे जीवन भर
अधियारे में जिनको देखा
उजियारे पहचान न पाए
कही पुजारी पूजा बेचे
कही मौलवी मौलापन
नही मिला फिर कही देखने
बचपन का वो भोलापन
जीवन भर जी कर भी हम -तुम
मिल न पाए अपने से
क्या मुझको क्या तुम्हे मिला है
जीवन के इस वन में जी कर ........

Monday, January 31, 2011

जमीनी हकीकत

राम खिलावन और बलभद्र अपनी चिर परिचित मुद्रा में बैठे बतिया रहे थे सामने ताजा-ताजा अखबार फैला हुआ था जिसे रामखिलावन दादा ने हेड लाइन से ले कर अंतिम पृष्ठ तक पठ चुके थे अब वे उसे बोख्बा बारी को देने वाले थे जिसे वे रोज की तरह आवश्कतानुसार अपनी भट्टी को समर्पित करते
गांव के विद्वान ,मनीषी ,उजबक जब सब दीन दुनिया की खबरों से रूबरू हो जाते तो फिर भला अखबार का और क्या काम वो बोखाबा बारी के हाथो अपने आप को अग्नि में समाहित कर स्वाहा स्वाहा हो जाता
अखबार में एक खबर गर्म थी सो उसी को ले कर रामखिलावन बतिया रहे थे ,दूर गांव के एक किसान ने कामधेनु योजना के अंतर्गत अपने खेत में कुआ खुदवाया था सरकारी योजना के तहत एक साल में ही कुए की जुड़ाई सरक गयी सरकार की तरह धस अलग गया ,किसान ने इसकी शिकायत जिले के कलेक्टर से की सो सरपंच पर बन आई ,सरपंच ने किसान की ऐसी तैसी कर दी बेटा कुआ खुदवाया उसमे पानी भी निकला दीवार धस गयी तो मेरी शिकायत कर आये अब बेटा पियो पानी गांव में तो जाने अब ससुरे तुम्हारा पानी न निकला तो कहना बेचारा किसान गांव छोड़ राजधानी में दस दिन से दल बल सहित डेरा डाले है मुख्य मंत्री से मिलने उन्ही से कहेगा सब कुछ और वो है कि मिल नही पा रहे है वो मिले भी तो कैसे प्रदेश के विकास में दिन रात एक किये है
विकास की दर प्रदेश में क्या देश में बठ रही है रामखिलावन बोले भैया विकास दर बठ रही है कि विनाश दर ..............