Monday, February 11, 2013

ramkhilvn


साल भर , रामखिलावन नदारत रहे ,कहा रहे गोपनीय है , शायद उन्हें खुद ही नही मालूम की वो कहा रहे ,भटकते रहे जैसे सब भटक रहे है कोई भक्ति में कोई शक्ति में । इस बीच उन्होंने खुरदुरी दाड़ी  जरुर बढ़ा  ली है जिसे वो कभी कभी यु ही खजुआ लेते है ,बलभद्र का सोचना दूसरा है वो कहता है शायद जुए पड़े हो ,बेहरहाल खजुआने के बाद वो सकून महसूस करते देखे गए है ऐसे जैसे किसी राष्ट्रीय समस्या का निदान हो गया हो ।
 बहुत दिनों बाद गांव पहुचने से उनकी आव भगत भी काफी हो रही है , भीड़ में किसी गुलछर्रे ने पीछे से उनकी कछनी खोलने का प्रयास किया पर सफल नही हो सका बलभद्र ने धर- धमका दो लाते अलग से दी , ससुरे जीने नही देगे , पता चला घुनघुटी था ,रामबहोर का लौड़ा ...बस यही रह गया है खुलने खुलाने का खेल इस देश में ,संसद से ले कर गांव गलियों तक इसी में व्यस्त है सब ,विकास हो रहा है सुनहरा विकास चौतरफा विकास पर उसमे हम कही नजर नहीं आते ।
विकास एक प्रक्रिया है जो धीरे धीरे होती है कभी कभी तेजी से भी विकास हो जाता है जैसे कुछ रेले पैसेन्जर होती है और कुछ मेल ,सुपर फ़ास्ट ,दुरानातो जो हर जगह नहीं रूकती निर्धारित जगहों पर ही रूकती है इसी तरह विकास भी वही वही   बहुत तेज होता है और ज्यादा तर  जगहों पर  पैसंजर की तरह कही कही तो बिलकुल भी नहीं होता ,विकास के लिए पटरी होना ,पटरी खाना अनिवार्यता है पटरी नहीं बैठी तो विकास कहा से होगा ससुरो इत्ती  सी बात समझ में आती नहीं ,चले विकास करने , तालाब खुदा नहीं की हो गए नंगे नहाने के लिए ।
देश कोई रबर का छल्ला तो है नहीं कि  खीचा और विकास हो गया विकास की नीतिया होती है नियम कानूनों से विकास होता है ,विकास राम निहोर का नाती नहीं  और न ही राम दुलारी की बिटिया क़ि ,पूनम 
के चाँद की तरह विकसित हो जाये । 
 राम खिलावन पिछले सालो में देश के विकास को ले कर चिंतित है चिंता में डूबे है अभी अभी उतराए है सो चल दिए अपने गांव की तरफ और यहाँ है कि गांव के लुच्चे उनकी कछनी खोलने में उतारू है कैसे हो विकास और  किसका हो किसका न हो ये सब बाते रामखिलावन के मन में गोता  खा रही है  उन्होंने बलभद्र को लिया और अमराई की तरफ निकल गये .......

Monday, May 14, 2012

 राम राम 

Tuesday, February 15, 2011

सोंधी सोंधी सी यादे ............

कैसे थे वे दिन मुए और कैसी थी वे रात
जाने भी अनजाने लगे तन मन देत सुहात
बादल कहा से आये थे और कहा पे जा बरसे
कुछ भी तो नही सूझता बस हम तो बस तरसे
आखोँ की भाषा पठे अखियाँ रुक रुक कर
गरदन भी उठती रही आखिर झुकझुक कर
सोंधी सोंधी सी यादे मन में परत फुहार
क्या फिर से मिल पाएंगे जीवन में एक बार

Monday, February 14, 2011

बुलबुल ने दम तोडा ..........

बुलबुल ने दम तोडा , बुल ने किया उपास
कंकरीट के जंगलो तुमने किया उदास
तोता -मैना जा उड़े , अब जाने कहा पे बैठे
बलिहारी शहरी करन ,जो गांव के आंगे ऐठे
आती -जाती थी रही , गौरईया सोनचिरैया
अब तो ठुठे पेड जिनमे लगती नही बरैया
कौवा आता था लिए , मेहमानों का सन्देश
अब तो खुद ही भटक रहे देश हुआ परदेश

Wednesday, February 2, 2011

कहा है अपनापन ........

खूब गौरईया बैठती , थे आँगन और मुडेर
अब बलिहारी खिड़किया ,जो खुलती है कुछ देर
रातो में तारे गिने , और खूब बुने सपने
खाली के खाली रहे , कोई भये न अपने
रात बियारी में रहा ,घी का सोंधापन
कहा गया वो बचपना कहा है अपनापन

जीवन भर हारे जीवन से .......

जीवन भर हारे जीवन से
जी न पाए तन -मन से
सांसो का ये हीरामन
कब कहा उड़ा ले जायेगा
बाहर की आखे खुली हुयी
भीतर की मुदरी मुंदी हुयी
सुख दुःख के इस धुप छाव में
चल -चल जीवन थक जायेगा
मिल -जुल कर हम नही रहे
बाहर ही बाहर जुड़े रहे
भीतर का कोहराम लिए
सत्य राम नाम हो जायेगा
गाजे बाजे बाजेंगे
डोली चढ़ कर जांएगे
रोज -रोज का अस्त -उदय
सब यही धरा रह जायेगा