Wednesday, February 13, 2013

कुम्भ की कहानी से रामखिलावन रूबरू हो रहे है ,जाके  कुछ पुन्य कमाना चाहते है ,फोकट में जब मिल रहा है तो क्यों छोड़ा जाये ,पाप न लग जाये । कही कोई ऐसा भी विधान न हो ,कि जो कुम्भ में न जायेगा तो बेटा  मरोगे तो सीधे नरक में जाओगे लिखा हो ,फिर बिलबिलाते रहोगे ,फोकट में पुन्य मिल रहा था तो लुटा नहीं अब ससुरे हिसाब किताब में भिड़े है कि हमने इतने पुन्य किये इतने पाप ।
सो रामखिलावन बलभद्र को लिए प्रयाग के लिए रवाना हो लिए साथ में दंड कमंडल लिए ,दाड़ी तो पहले से बढ़ी थी । रेलों में रेलम रेल मची हुयी है बसों में पैर रखने की जगह नहीं है जाये तो कैसे जाये फिर भी रामखिलावन के पाँव नहीं रुके ,रुके तो प्रयाग में ही जा कर । लाखो क्या करोडो लोगो के साथ वे भी गुम गए अपनी कछनी संभाले जो की बीच बीच में दगा देने की स्थिति में आ जाती थी खैर ,राम खिलावन कुम्भ का पुन्य लूटने को आतुर चले आये ।
भिडम भाड़ ,एक दुसरे को लोग  कचरे जा रहे है पर बढे  जा रहे है पुन्य लूटने  के चक्कर में कुछ लोग पहले ही  लुट चुके है लुटे लुटाये लोग अपनी अलग पंक्ति बनाये  हाथ जोड़े एक दरोगा के सामने कुछ फरियाद करने की मुद्रा में भयभीत से खड़े है ,दरोगा  के चक्कर में  सारे  मंत्र ,तंत्र भूल भाल गए है  बस दरोगा कृपानिधान से लग रहे है   जो अपने हाथ में लिए डंडे को चक्र सुदर्शन सा घुमा रहे है , भोले भाले  भगवान  के भोले भाले  भक्त सन्निपात  से ग्रसित दिख रहे है  ,एफ आई आर लिखने की नही बन रही थी सो नाम पता लिख लूटे लुटाये भक्तो को एक एक कर किनारे कर दिया गया जाओ भईया अब अगले कुम्भ में न दिखाना ,पुन्य कमाने के चक्कर में ये सभी शुन्य हो गए थे ,रामखिलावन धन्य हो गए प्रभु की महिमा देख कर ,लोग पभु की महिमा भर देख पाते है जीवन भर पर प्रभु को नहीं देख पाते , बलभद्र कहते है दादा हम जब जादू  देखते है तो जादूगर को भी देख पाते  है पर प्रभु की माया तो देखते है लेकिन  प्रभु को क्यों नहीं .....इस  यक्ष प्रश्न ने  रामखिलावन को धर दबोचा और वे धरे रह गए का बोलते ,इस पाखण्डी संसार में जहा खंड खंड पाखंड है और हम सब भी उसी में रचे बसे है क्या कहे और क्या करे कुम्भ में भी वही सब हो रहा है जो इस संसार में हो रहा है ,कुम्भ संसार से बाहर नहीं है और न ही सन्यासी ,यहाँ भी वही छल प्रपंच है जो संसार में व्याप्त है एक एक से बढ़ कर आये है छलिया तरह तरह के नट है शठ है लूट  है लुटेरे है राम नाम की लूट  है लूट सके तो लूट अंत काल  पछतायेगा जब प्राण जायेंगे छूट  ...........

Tuesday, February 12, 2013

विकास की गंगा ,रामखिलावन , भागीरथ की तरह लाना और  बहाना चाहते थे पर वो  थी कि सीधी सीधी  बहने को तैयार नहीं थी ,टेढ़ी मेढ़ी जितना चाहो बहा लो ,बलभद्र ने भी बताया कि दादा गंगा को देखो न कहा सीधी सीधी बहती है वह भी तो टेढ़ी मेढ़ी बहती है तुम लगे हो नाहक पसीना बहाने में जब गंगा टेढ़ी मेढ़ी बहती है तो विकास भी टेढ़ा मेढ़ा  होगा यह बात राम खिलावन के मन में घुस गयी और वे शांत हो गये इस देश में हर चीज टेढ़ी मेढ़ी ही होगी ।
तभी तो विकाश भी सीधा सीधा नही होता ,कोई काम भी आज सीधे तरीके से नहीं होता चाहे राशन कार्ड बनवाना हो या वोटर लिस्ट में नाम लिखना हो स्कुल में एडमिशन हो या गैस की टंकी लेनी हो ,इस देश में तिकड़म अनिवार्यता है दस प्रश्नों में पांच  प्रश्न करने है किन्तु प्रथम प्रश्न अनिवार्य है साफ सफाई के दो अंक प्रथक से मिलेगे ,ऐसा ही है सब कुछ ऐसे नेक विचार से बलभद्र ने अपने स्वयं - भू देव राम खिलावन को बताया , जिससे रामखिलावन हद्प्रद  हो गये ।
रामखिलावन हदप्रद  थे पर बलभद्र सोच रहे थे कि वे गदगद है उसकी बात सुन कर पर रामखिलावन की कुछ कुछ गंभीर मुद्रा देख बालक बलभद्र मासूम हो गए कुछ देर माहोल शांत ही बना रहा और आगे भी बना रहता लेकिन एक कनखजूरे ने सारे माहौल को बरबाद कर दिया ससुरा रामखिलावन की कछनी में घुसा जा रहा था ,ये तो भला हो कि संत ने अपनी समाधी तोड़ी नहीं तो ...पता नहीं क्या क्या टूटता ।
टुटा तो रामखिलावन का मन है इस विकास को देख कर ,टूटे मन को लिए वे देश में भटक रहे है उन्हें अपना देश ही परदेश सा दिखने लगा है ,अपनों के बीच ही पराये से हो गए है लोग बाग  है कि प्यास बुझने  के बाद कुए की तरफ पीठ कर लेते है ,नदी पार कर लेने के बाद कौन नाव को लिए शहर- शहर घुमाता है .................. 
 

Monday, February 11, 2013

ramkhilvn


साल भर , रामखिलावन नदारत रहे ,कहा रहे गोपनीय है , शायद उन्हें खुद ही नही मालूम की वो कहा रहे ,भटकते रहे जैसे सब भटक रहे है कोई भक्ति में कोई शक्ति में । इस बीच उन्होंने खुरदुरी दाड़ी  जरुर बढ़ा  ली है जिसे वो कभी कभी यु ही खजुआ लेते है ,बलभद्र का सोचना दूसरा है वो कहता है शायद जुए पड़े हो ,बेहरहाल खजुआने के बाद वो सकून महसूस करते देखे गए है ऐसे जैसे किसी राष्ट्रीय समस्या का निदान हो गया हो ।
 बहुत दिनों बाद गांव पहुचने से उनकी आव भगत भी काफी हो रही है , भीड़ में किसी गुलछर्रे ने पीछे से उनकी कछनी खोलने का प्रयास किया पर सफल नही हो सका बलभद्र ने धर- धमका दो लाते अलग से दी , ससुरे जीने नही देगे , पता चला घुनघुटी था ,रामबहोर का लौड़ा ...बस यही रह गया है खुलने खुलाने का खेल इस देश में ,संसद से ले कर गांव गलियों तक इसी में व्यस्त है सब ,विकास हो रहा है सुनहरा विकास चौतरफा विकास पर उसमे हम कही नजर नहीं आते ।
विकास एक प्रक्रिया है जो धीरे धीरे होती है कभी कभी तेजी से भी विकास हो जाता है जैसे कुछ रेले पैसेन्जर होती है और कुछ मेल ,सुपर फ़ास्ट ,दुरानातो जो हर जगह नहीं रूकती निर्धारित जगहों पर ही रूकती है इसी तरह विकास भी वही वही   बहुत तेज होता है और ज्यादा तर  जगहों पर  पैसंजर की तरह कही कही तो बिलकुल भी नहीं होता ,विकास के लिए पटरी होना ,पटरी खाना अनिवार्यता है पटरी नहीं बैठी तो विकास कहा से होगा ससुरो इत्ती  सी बात समझ में आती नहीं ,चले विकास करने , तालाब खुदा नहीं की हो गए नंगे नहाने के लिए ।
देश कोई रबर का छल्ला तो है नहीं कि  खीचा और विकास हो गया विकास की नीतिया होती है नियम कानूनों से विकास होता है ,विकास राम निहोर का नाती नहीं  और न ही राम दुलारी की बिटिया क़ि ,पूनम 
के चाँद की तरह विकसित हो जाये । 
 राम खिलावन पिछले सालो में देश के विकास को ले कर चिंतित है चिंता में डूबे है अभी अभी उतराए है सो चल दिए अपने गांव की तरफ और यहाँ है कि गांव के लुच्चे उनकी कछनी खोलने में उतारू है कैसे हो विकास और  किसका हो किसका न हो ये सब बाते रामखिलावन के मन में गोता  खा रही है  उन्होंने बलभद्र को लिया और अमराई की तरफ निकल गये .......

Monday, May 14, 2012

 राम राम 

Tuesday, February 15, 2011

सोंधी सोंधी सी यादे ............

कैसे थे वे दिन मुए और कैसी थी वे रात
जाने भी अनजाने लगे तन मन देत सुहात
बादल कहा से आये थे और कहा पे जा बरसे
कुछ भी तो नही सूझता बस हम तो बस तरसे
आखोँ की भाषा पठे अखियाँ रुक रुक कर
गरदन भी उठती रही आखिर झुकझुक कर
सोंधी सोंधी सी यादे मन में परत फुहार
क्या फिर से मिल पाएंगे जीवन में एक बार

Monday, February 14, 2011

बुलबुल ने दम तोडा ..........

बुलबुल ने दम तोडा , बुल ने किया उपास
कंकरीट के जंगलो तुमने किया उदास
तोता -मैना जा उड़े , अब जाने कहा पे बैठे
बलिहारी शहरी करन ,जो गांव के आंगे ऐठे
आती -जाती थी रही , गौरईया सोनचिरैया
अब तो ठुठे पेड जिनमे लगती नही बरैया
कौवा आता था लिए , मेहमानों का सन्देश
अब तो खुद ही भटक रहे देश हुआ परदेश