Friday, June 12, 2009

राम खिलावन हाजिर है

राम खिलावन , आज तड़के से दिसा मैदान कर,सैर पर निकल गए थे वैसे तो रोज ही सैर पर जाते है उसके सेहत का राज ही सुबह की सैर है बिना नागा सालो साल से राम खिलावन अपने प्रति यह धर्म निभा रहे है
राम खिलावन का यह चिंतन है की जो धारण किए हो वही धर्म हैजैसे आग _जलना और जलाना धारण किए हुए है अतःआग का धर्म हुआ जलाना और जलाना
पानी _शीतलता ,फूल_महकना ,और प्रथ्वी _सहना धारण किए है
धर्म का मतलब जो धारण किए हो
रामखिलावन ने बलभद्र जो पास ही तमाखू घिस रहे थे से पूछा _
न बे बल्भदर ,आप भी कुछ धारण किए है या फ़िर हर हर गंगे
बलभद्र जिनके मुह में बबासीर है बोले _हम तो जाघिया धारण किए है ,तो हमारा धर्म क्या जाघिया हो गया ?
रामखिलावन बोले अबे ,हर हर गंगे ,ये ध्यान ,धारणा ,समाधी की बाते है ,तू नही समझेगा
बलभद्र बोले तो कौन समझेगा ?जो जाघिया धारण नही किए है ,वो समझेगे ?
बताओ रामखिलावन
रामखिलावन चुप्पी साध लिए ,कौन इस नमूने के मुह लगे
बलभद्र ,रामखिलावन की चुप्पी तोड़ने की नाकाम कोशिश करते रहे ,पर रामखिलावन तो रामखिलावन ,चुप ,तो चुप समझदार के लिए तो इशारा ही काफी है
ऐसा राम खिलावन का सोचना है
वैसे आप जो चाहे सोचे ,सोचे या नोचे राम खिलावन के चिंतन के चिंतन को कोई खलल नही पड़ता
रामखिलावन सोच रहा है की खुदा ने, भगवान ने ,परवरदिगार ने जिसने भी हमें इस लोक में भेजा है पता नही ,पर मानव बना कर ही भेजा और हम क्या बन गए ,यदि मानव बने रहते तो मानव धर्म ही निभाते ,रामखिलावन की जासूसी निगाहे सब देख रही है की कौन मानव है और कौन दानव
रामखिलावन सोच रहा है जो मानव बन कर अवतरित हुए थे और दानव बन गए है और वे दानव धर्म निभा रहे है तो कोई बात नही ,पर ,यदि आप ,अपने आप को मानव समझ रहे है और धर्म निभा रहे है दानव का तो क्या कहने ,हर हर गंगे
रामखिलावन यह भी जनता है की अब तो दानव पैदा ही नही हो रहे है द्वापर,त्रेता होता तो कहा भी जा सकता था अब तो केवल मानव ही पैदा हो रहे है और धर्म निभा रहे है .............................?का
रामखिलावन का चिंतन यही है की क्या हम मानव होते हुए मानव धर्म निभा रहे है ?
निभा रहे है तो जय हो जय हो नही तो --------------------?
रामखिलावन का चिंतन जारी है

Thursday, June 11, 2009

राम खिलावन हाजिर हे.

राम खिलावन आज नहा धो कर तरोताजा तरबूज की तरह महकते मंद मंद मुस्कुराते ओसारी के नीचे खटिया में पड़े `कुछ ' सोच रहे थे क्या सोच रहे थे वो सोच रहे थे की ये कुछ है क्या बला?जब भी कोई लफडा होता है या न भी ho सामान्य रूप से भी तो भी सब यही कहते कुछ तो है,इसी कुछ को राम खिलावन खोज रहा है की कैसे मिलेगा कुछ मिलेगा तो पुछुगा की तू है क्या बे ?राम खिलावन की यह धारणा है की स्रास्टी के उत्पन होने के पीछे भी कुछ तो रहा होगायही कुछ आज राम किलावन का दिमाग ख़राब किए है
ये कुछ ,जो है निराकार है वह कही भी बिना स्वरुप के होता है पर उसे लगता है की बिना आकार के,स्वरुप के वह हो कैसे सकता है भगवान है क्या ?नही कटाईकुछ न कुछ तो है पर ,साला दिखता नही है जैसे हवा,ये भी तो कहा दिखती है,पर रहती है ,चलती है महसूस होती है फ़िर सोचता है की हवा तो प्रकति का हिस्सा है तो क्या यह मान लिया जाए की कुछ भी प्रकृति का हिस्सा है राम खिलावन सोच रहा था की यह क्या अजन्मा है ,इसकी कोई भोतिक काया भी नही दिखती है की गला पकड़ लू और पुछू की क्यो बे तू है क्या ?राम खिलावन इतना तो समझा गया था की कुछ तो लफडा है कुछ के साथ तभी तो दिखता नही फ़िर सोचने लगा की भगवान भी तो नही दिखता ,परवरदिगार खा छिपे हो ,मोहन प्यारे दर्शन दो घनस्याम मोरी अखिया प्यासी रे ............पर खा प्यास बुझती है जिनकी प्यास बुझानी थी द्वापर ,त्रेता में बुझ गई अब तो रटते रहो प्यारे मोरी अखिया प्यासी रे ,प्यासी ही रहेगी अखिया इन अखियो से जब तक कुछ को नहीं लोंगे कुछ भी नहीं मिलेगा समझे
कल ही कोई ख रहा था की रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे के साथ भाग गई ,पास में खड़े बलभद्र जिन्हें बिना बोले रहा नहीं जाता ,अपच की बीमारी से ग्रसित है कुछ रहा होगा ,तभी तो भागी है कुछ न होता तो क्यो भागती भला राम खिलावन सोचने लगा मतलब कुछ लड़कियों को भगाने में अपना योगदान देता है ये तो बडा लफडे वाला लगता है क्या किया जाए कुछ के लिए कुछ करना पड़ेगा ऐसा मन राम खिलावन का हो रहा था वे चुपचाप इसी mishan में लगे है की कुछ मिले तो कुछ करे pahale तो कुछ को दे marege फ़िर कुछ karege पर जब मिले tab na
ramkhilavan का कुछ को ले कर vichalan swabhavik है manav है आप जैसा नहीं की कुछ को dudane की कोशिश क्या सोचते भी नहीं है आप अकेला ramkhilavan क्या डूड payega कुछ को ,कुछ तो tamam bagra है पर पकड़ में नहीं आ रहा है यही तो smasya है,बलभद्र के ऊपर से तो उसका vishvas tb से ud गया जब से उसने कहा था की रघुवंस की बिटिया भागने में भी कुछ था tb भी उसने उसे पकड़ा नहीं पकड़ लेता कुछ karata चाहे न मेरे पास तो lata फ़िर में dekhata उस कुछ को पर नहीं bolege jarur कुछ था ,कुछ है पर pakadege नहीं मेरे पास layege नहीं सब sale कुछ से मिले jule है ऐसा लगता है
कभी कभी ramkhilavan यह भी सोचता है की कही कुछ लोग कुछ के पीछे तो नहीं पड़े है hath धो के कुछ karata चाहे कुछ भी न हो और ये सब कुछ का नाम ले कर उसे badanam कर रहे हो ramkhilavan chintak की mudra में kafi देर तक इसी bat पर चिंतन करते रहे ,chinta तो वे करते नहीं ये आप भी jante है क्यो की chaturai ghatati है
कुछ तो कुछ है पर ये वही janate है जिन्हें कुछ कुछ होता है आप को हुआ है क्या ?कुछ कुछ ramkhilavan यह सोचता है की ये कुछ कुछ कैसा होता है ?आकार लिए होता है या फ़िर निराकार ही होता है वह यह भी सोच रहा है की कुछ और कुछ में अन्तर होता है ऐसा aabhash उसे हुआ और वह achakchiya के ud baida की are कुछ है वह उसे dudane लगा khub duda पर मिला नहीं ,ये कुछ भी क्या bla है ,है भी ,पर है भी नहीं
baharhal राम खिलावन कुछ को खोजने में prayasrat है जिन्हें उनके bap भी नहीं खोज paye पर ramkhilavan का कुछ पे चिंतन jari है

Wednesday, June 10, 2009

राम खिलावन हाजिर है

राम खिलावन शहर की आवोहवा से परेसान हो सड़क का किनारे बैठा सोचा रहा था कि,क्या किया जाए इस समस्या से कैसे निजात पाई जाए, जब की सही यह है की उसके बाप को भी पता नही है कि शहर कि आवोहवा को , कैसे ठीक किया जाए किनारे लगे नल में पानी नही आ रहा था कि वह पानी ही पी ले और व्यवस्था के विरोध में उठते ज्वार भाटे को शांत कर ले इतने में ए़क भट सूअर ठेर सारा धुँआ उसके पास छोड़ कर अपनी रफ्तार से मंजिल कि और बठा चला गया ,इस अनचाहे धुएं ने रामखिलावान कि सोच में खलल दल दिया ,उसके मुह से गाली निकलने ही वाली थी लेकिन यह सोच कर नही निकल पाई कि साला सुनेगा कौन राम खिलावन के लिए साला कोई गली नही मात्र संबोधन है जिसे वे कभी भी किसी के लिए निसंकोच उपयोग कर लेते है
राम खिलावन सोच रहे थे कि नल है मगर पानी नही आ रहा ,अस्पताल है पर डाक्टर नदारत है कम्पौंदर ही डाक्टर बने बैठे है और मरीजो को टंच कर रहे है दोनों मरीज और कम्पौंदर भ्रम में जी रहे है कम्पौदर सोच रहा है कि मै डॉक्टर से कम नही और मरीज सोच रहा है कि मै कम्पौदर साहब कीलिखी दवाओ के असर से ठीक हो गया हूस्कुल है पर मास्टर नही आता ,गुरु जी है लौडो को क्या पठा रहे है उन्हें ख़ुद ही पता नही गुरु जी है ,पालनहारा की यह अनुपम कृति है ,उपहार है ,प्रदेश के नौनिहालों के लिए गुरु जी ,जो ज्यादातर अपने को नियमित करने और वेतन के अड़पेचो के सुधारवादी कार्यक्रम में लगे रहते है और फ़िर,जब भी वक्त मिलता है स्कुल का चक्कर लगा आते है
क्या होगा इस देश का प्रदेश का ? रामखिलावन शहर की एक सड़क के किनारे पद्माशन की मुद्रा में बैठ इस गूढ़ रहस्य को समझने की बलात कोशिश कर रहे थे कही देश,हिंद महा सागर नही डूब जाए इस तरह की अव्यव्स्थाओ के चलते प्रदेश तो डूब ही नही सकता क्यो की सागर बहुत दूर है देश के डूबने के चांसेज ज्यादा है फ़िर वह सोचने लगा की यदि देश डूबेगा तो प्रदेश भी तो डूबेगा क्या वह चड्डी पहने किनारे खड़ा रहेगा फ़िर वह सोचने लगा की हिंद देश, यदि डूबा भी तो हिंद महा सागर में ही तो डूबेगा वह भी तो अपना ही है ,किसी दुसरे सागर में तो डूबने जाएगा नही क्यो की वो सब दूर है अपना ,अपने में ही तो डूब रहा है इससे अच्छी बात और क्या हो सकती भगत भगवान से मिले या भगवान भगत से बात तो एक ही हैपर उसने सुन रखा था की कृष्ण की द्वारका वाकई में समुन्द्र में समाहित हो गई है कही ऐसा हुआ है तो क्या यह मन लिया जाए की उस समय भी इसी प्रकार की अव्यवास्थाओ के चलते जैसा मै सोच रहा हू हुआ होगा
राम खिलावन ने अपने को वैचारिक घालमेल में फसता देख और विचलित हो गया तब तक एक कनखजूरा उसके अर्ध नग्न शरीर में फसे कपड़ो के भीतर पता नही कहा से बिना पूछे घुस गया ;घुसा तो घुसा कोई बात नही ,झाड़ पोछ कर राम खिलावन फारिग हो जाते पर इस कनखजूरे ने तो बिना पूछे कस कर कट भी लिया ,राम खिलावन बिलबिला पड़े ;और एक छुट्टा गाली देते हुए कनखजूरे को बाहर निकाल फेका तबियत से उसकी चटनी बना दी ,कनखजूरा वीरगति को प्राप्त हो गया ,तब राम खिलावन को चैन मिला
ऐसे अप्रासंगिक छडो को छोड़ कर राम खिलावन का स्वभाव चिन्तक का है वे मूलतः चिन्तक ही है आप सोच रहे होंगे की चिन्तक शासकीय, अर्धशासकीय, नय्नाविराम इमारतो ,सरकारी बंगलो या टोपी तप लगाये दाठी बढाये झुके कंधो में झोला लटकाए या काफी हाउस में चार घंटे के हिसाब से चार बार काफी पीने वाले या चमचमाती कार में सत्ता के इर्द गिर्द चक्कर लगाते पाए जाते है तो आप ग़लत है राम खिलावन आपको ,आप के आस पास कही भी मिल जाएगा ;चिन्तक की मुद्रा में ,देखे तो सही हा, राम खिलावन को देखने के लिए आखे चाहिए बटन नही
राम खिलावन एक अधभुत प्राणी है वो चिंता नही चिंतन में विश्वास रखता है ,क्यो की उसे मालूम है की चिंता करने से चतुराई घटती है और चुतियाई बढ़ती है और आप जान ,की राम खिलावन को चुतियाई से बड़ा parhej है ,उसी तरह जय से madhumeh के मरीज को gulguley से ये बात अलग है की चोरी छिपे kha ही लेते है ,वैसे ही राम खिलावन भी कभी कभी दिल bahlane के लिए chutiyai कर ही bhaithate है
baharhal अभी तो राम खिलावन के चिंतन का विषय शहर की aavohawa को कैसे badala जाए ,है जिसे उसके बाप भी नही badal पाए ,खैर चिंतन jari है

Sunday, June 7, 2009

डॉ.पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह और डॉ.अंशु माला सिंह ,बैकुंठी

Saturday, June 6, 2009

दोहे ,तुम्हारे लिए

गली गली में राधाये, गली गली में कृष्ण
मन ही मन उत्तर मिले ,नही पूछने प्रश्न

छिप छिप कर मिलते रहे अब तक कितनी बार
गुलमोहर की छाव में पकड़ गए कचनार

ठगने वाले ठगे गए है अब की पहली बार
ठाढे मोल हुए है सौदे , पहली पहली बार

अमलतास धीरे से बोला , आओ आओ मैना
छिप छिप के प्यार करे, और मिलाये नैना

Monday, June 1, 2009

यदि मै उसको अपना कहता तो फ़िर कौन तुम्हारा होगा
क्या तुमको क्या मुझे मिलेगा यदि उसका बटवारा होगा
जो मेरा है वही तुम्हारा बोलो अब क्या प्रश्न शेष है
मत जीवन की करो कल्पना देखो कितनी सास शेष है
गत तो गत है आगत को मै देखा रहा टकटकी लगाये
किसी तरह यदि दिन बीता तो देखो कितनी रात शेष है
मत जीवन की करो कल्पना देखो कितनी सास शेष है