राम खिलावन यत्र ,तत्र ,सर्वत्र हाजिर है देखे आज कही आपके पास तो नही पहुच गए
कही वे आकार लिए होते है तो , कही निराकार ,आकार से तो आप उन्हें पहचान लेगे यदि आखे हुई ,बटन नही ,पर निराकार होने ,पर कैसे पहचान पायेगे ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की आप तो आकार लिए हो पर क्या अपने आप को पहचान पाए हो की हमें ही पहचान पाओगे ?
हम सब बाहर की दुनिया में जीते है अन्दर की दुनिया में जाने में नानी याद आती है ,
राम खिलावन कहते है
बाहर कंकर ,पत्थर ओ ,अन्दर गौरी शंकर
ये उसने कही सुन रखा था सो सब को यही बताया करता था ,
उसकी इन बातो को ज्यादातर लोग अनसुना कर देते है जैसे आप कर रहे है
कुल मिला कर राम खिलावन अन्दर का मॉल बाहर ही तो करने को कह रहे है पर कौन करता है अन्दर का मॉल बाहर , सब बाहर का मॉल अन्दर करने में लगे है ,आप की क्या राय है ,अपने बारे में ,दूसरे के बारे में न कहे तो बेहतर होगा ,पहले अपने आप से पूछ ले ,अपने आप को जान ले ,फ़िर दुसरे के बारे में जाने
राम खिलावन अपने को जानता है दूसरो को जानने की कोशिश भी नही करता क्यो करे ,जान कर करेगा भी क्या? ,आचार डालने के लायक भी तो नही hai koi
बलभद्र कहता है वो सब को जानता है ,अपने को छोड़ कर ,
ये अलग बात है की उसे कोई नही जानता
हम राम को, बलराम को ,जानते है खुदा की खुदाई को भी जानते है ,
पर अपने आप को क्यो जानने की कोशिश नही करते ?
शायद किसी ने रोका है आपको ?
राम खिलावन का चिंतन यह है की किसी ने नही आप ने ख़ुद अपने आप को रोक रखा है
बाहर आनंद है तो अन्दर , परमानद है
राम खिलावन ,मोलश्री के पेड़ के नीचे बैठे',चिंतन कर ही रहे थे की ,बलभद्र प्रशाद ,अपनी कछनी संभालते संभालते पहुच ही गए ,
रामखिलावन बोले ऐचेकताना ,कहा से सवारी आ रही है ?
का बताई ,कहा से आ रहे है ,
सोसायटी गए रहे की कुछ राशन ले आवे ,
तो का हुआ,
राशन सब ख़तम और का ,चले आए मुह लटकाए ,पता नही कोउन लईगा हमारे नाम का राशन?
बोखवा sudama bhi vahi baitha raha ham to chale aaye par wo abhi bhi baitha hai
intjar me
किसके इंतजार में ? रामखिलावन ने पूछा
सोसायटी के बाबू के और किसके ,
अच्छा अच्छा ,हम सोच रहे थे की वहा अफशर ही अफशर होते है खैर ,खुदा खैर करे ,सुदामा का
बलभद्र ,पास ही पड़े ताजे अखवार के समाचार पठने लगे
मुनाफाखोरों को बक्सा नही जाएगा ,बक्सों में बंद कर दिया जायेगा ,सुनो ,सुनों ,सुनो ,
आज की ताजा ख़बर सुनो
और कब खोला जाएगा यह सरकार तय करेगी सुनों ,सुनों ,सुनों
आज की ताजा ख़बर सुनों
रामखिलावन का ताज़ी ख़बर पर चिंतन जारी है ,
ये अलग बात है की उनके बाप रोज ताज़ी ख़बर ही पढ़ते थे ,जो दूसरे दिन बासी हो जाती थी और फ़िर वो भूल जाते थे की कल क्या ख़बर थी ,क्यो की वे वर्त्तमान में जीते थे और रामखिलावन भी अपने बाप की तरह वर्तमान को ही जीता है ,बासी बातो,खयालातो को राम खिलावन लात मारता है
बिल्कुल अपने बाप की तरह
रामखिलावन गुनगुना रहे है लागा चुनरी में दाग छिपाऊ कैसे ,घर जाऊ कैसे ,लागा चुनरी में दाग ............
Sunday, June 14, 2009
हम है पखेरू बहुत दूर के
भारत भवन भोपाल , में सालो साल पहले पधारे ए़क कवि की कविता की कुछ पक्तिया ,
आपके लिए
प्रेम से तुम सुनो ,और
सुन कर गुनो,
मन मिलाओगे, तो मन से ,
जुड़ जायेगे ,
वरना हम है ,
पखेरू बहुत दूर के ,
बोलिया ,बोल अपनी ,
उड़ जायेगे
आपके लिए
प्रेम से तुम सुनो ,और
सुन कर गुनो,
मन मिलाओगे, तो मन से ,
जुड़ जायेगे ,
वरना हम है ,
पखेरू बहुत दूर के ,
बोलिया ,बोल अपनी ,
उड़ जायेगे
Saturday, June 13, 2009
राम खिलावन हाजिर है
राम खिलावन संत ,सनसनाते हुए आए और धम्म से ओसरी में धरे तखत में बैठ गए सोच रहे थे कहा फस गए ,माया ने तो पहले से फसा रखा है , और ,अब ये नया लफडा ,माया से बडा तो कोई लफडा है नही फ़िर ये फसना,फ़साना क्या ?
सब माया है ,
सब काया है
कही धूप कही छाया है,गुनगुनाते हुए रामखिलावन चिंतन में डूब गए
बलभद्र चुतियाई की बाते बहुत करता है ,कल कह रहा था,
रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे से फ़सी थी इसी लिए भागी थी ,कभी कुछ तो कभी कुछ कहता है ,उसकी समझ में तो कुछ आता नही ,ऊपर से हमें समझाने चला है
तभी बलभद्र ताबड़तोड़ सायकिल भगाते ओसारी से आ टकराए ब्रेक तो था नही यदि था भी तो लगते लगते लगता था ,तब तक जो होना होता था हो जाता था ,पिट पिटा जाते थे या छिल छुला जाते थे ,पर सायकिल का ब्रेक था की सुधरने की नाम नही लेता था जैसे बलभद्र ख़ुद सुधर नही रहे है और दुसरे को सुधारने में अपनी उर्जा तो उर्जा गुप्त उर्जा को भी लगाये पड़े है
राम खिलावन दस बार बता चुके है की बल्भदर बेटा उर्जा एक ही होती है सौ ,पचास नही होती है तुम्हारे भेजे में क्यो नही धसती है ये बात ,बता
बलभद्र ,को तो जो समझाना होता था वही समझते और जो नही समझाना होता था उसमे आय बाय करने लगते कुल मिला कर वो अपने मर्जी के गुलाम थे ,बिना मर्जी के कुछ नही करते थे और न ही कोई माई का लल्लू उनसे कुछ करा भी सकता था
रामखिलावन को इस बात का भी मलाल रहा करता है की फ़िर वो कुछ पूछता क्यो है जब उसे करना अपने मन का ही है क्यों मेरा समय जाया करता है ,मनमौजी लाल
फसने फ़साने की बात तो राम खिलावन को पसंद ही नही आई कभी ,उनका दर्शन बहुत स्प्रस्त्त था की माया से बडा कोई फंदा नही है जब उसमे फसे है तो फ़िर ये फसना फ़साना क्या मायने रखता है इस काया में रहते क्या कोई माया के फंदे को तोड़ पाया है रामखिलावन यह भी जानते है की माया बडी ठगनी है,
रामखिलावन ,ठगनी ,ठगने में भी विस्वास नही रखते है वो ठगे जाने में विस्वास रखते है कोई भी ठग ले ,खड़े है रामखिलावन ठगे जाने के लिए आओ और ठगों ,रामखिलावन कहते ,ठग कर करोगे kya ,rakhoge कहा ,कहा जाओगे ,वही जाओगे न jaha से आए हो ,भूल गए kafan में जेब नही होता ,तुमने yadad bana रखे हो ये बात अलग है , kisi ko batana mat nahi to pichhe पड़ जायेंगे तुम्हारे की मेरे kafan में भी bana दो ,जेब क्या करोगे ,फस जाओगे ,fasoge क्या फसे तो हो ही ,क्या कहने है ,आपके, जय हो जय हो
राम खिलावन ,इसी udhed bun में khoye हुए थे की बलभद्र की सायकिल ने unake चिंतन को जोर का jhataka दिया और वे jhatak कर बैठ गए क्यो बे, कहा से chidimaro की तरह आ रहे हो ?
kaku का बताये sunoge तो sunaau ,पंचायत का बड़ा baabu धर लिए गए है
रामखिलावन का चिंतन jari है माया है सब माया है कही धूप कही छाया है
सब माया है ,
सब काया है
कही धूप कही छाया है,गुनगुनाते हुए रामखिलावन चिंतन में डूब गए
बलभद्र चुतियाई की बाते बहुत करता है ,कल कह रहा था,
रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे से फ़सी थी इसी लिए भागी थी ,कभी कुछ तो कभी कुछ कहता है ,उसकी समझ में तो कुछ आता नही ,ऊपर से हमें समझाने चला है
तभी बलभद्र ताबड़तोड़ सायकिल भगाते ओसारी से आ टकराए ब्रेक तो था नही यदि था भी तो लगते लगते लगता था ,तब तक जो होना होता था हो जाता था ,पिट पिटा जाते थे या छिल छुला जाते थे ,पर सायकिल का ब्रेक था की सुधरने की नाम नही लेता था जैसे बलभद्र ख़ुद सुधर नही रहे है और दुसरे को सुधारने में अपनी उर्जा तो उर्जा गुप्त उर्जा को भी लगाये पड़े है
राम खिलावन दस बार बता चुके है की बल्भदर बेटा उर्जा एक ही होती है सौ ,पचास नही होती है तुम्हारे भेजे में क्यो नही धसती है ये बात ,बता
बलभद्र ,को तो जो समझाना होता था वही समझते और जो नही समझाना होता था उसमे आय बाय करने लगते कुल मिला कर वो अपने मर्जी के गुलाम थे ,बिना मर्जी के कुछ नही करते थे और न ही कोई माई का लल्लू उनसे कुछ करा भी सकता था
रामखिलावन को इस बात का भी मलाल रहा करता है की फ़िर वो कुछ पूछता क्यो है जब उसे करना अपने मन का ही है क्यों मेरा समय जाया करता है ,मनमौजी लाल
फसने फ़साने की बात तो राम खिलावन को पसंद ही नही आई कभी ,उनका दर्शन बहुत स्प्रस्त्त था की माया से बडा कोई फंदा नही है जब उसमे फसे है तो फ़िर ये फसना फ़साना क्या मायने रखता है इस काया में रहते क्या कोई माया के फंदे को तोड़ पाया है रामखिलावन यह भी जानते है की माया बडी ठगनी है,
रामखिलावन ,ठगनी ,ठगने में भी विस्वास नही रखते है वो ठगे जाने में विस्वास रखते है कोई भी ठग ले ,खड़े है रामखिलावन ठगे जाने के लिए आओ और ठगों ,रामखिलावन कहते ,ठग कर करोगे kya ,rakhoge कहा ,कहा जाओगे ,वही जाओगे न jaha से आए हो ,भूल गए kafan में जेब नही होता ,तुमने yadad bana रखे हो ये बात अलग है , kisi ko batana mat nahi to pichhe पड़ जायेंगे तुम्हारे की मेरे kafan में भी bana दो ,जेब क्या करोगे ,फस जाओगे ,fasoge क्या फसे तो हो ही ,क्या कहने है ,आपके, जय हो जय हो
राम खिलावन ,इसी udhed bun में khoye हुए थे की बलभद्र की सायकिल ने unake चिंतन को जोर का jhataka दिया और वे jhatak कर बैठ गए क्यो बे, कहा से chidimaro की तरह आ रहे हो ?
kaku का बताये sunoge तो sunaau ,पंचायत का बड़ा baabu धर लिए गए है
रामखिलावन का चिंतन jari है माया है सब माया है कही धूप कही छाया है
Friday, June 12, 2009
राम खिलावन हाजिर है
राम खिलावन , आज तड़के से दिसा मैदान कर,सैर पर निकल गए थे वैसे तो रोज ही सैर पर जाते है उसके सेहत का राज ही सुबह की सैर है बिना नागा सालो साल से राम खिलावन अपने प्रति यह धर्म निभा रहे है
राम खिलावन का यह चिंतन है की जो धारण किए हो वही धर्म हैजैसे आग _जलना और जलाना धारण किए हुए है अतःआग का धर्म हुआ जलाना और जलाना
पानी _शीतलता ,फूल_महकना ,और प्रथ्वी _सहना धारण किए है
धर्म का मतलब जो धारण किए हो
रामखिलावन ने बलभद्र जो पास ही तमाखू घिस रहे थे से पूछा _
न बे बल्भदर ,आप भी कुछ धारण किए है या फ़िर हर हर गंगे
बलभद्र जिनके मुह में बबासीर है बोले _हम तो जाघिया धारण किए है ,तो हमारा धर्म क्या जाघिया हो गया ?
रामखिलावन बोले अबे ,हर हर गंगे ,ये ध्यान ,धारणा ,समाधी की बाते है ,तू नही समझेगा
बलभद्र बोले तो कौन समझेगा ?जो जाघिया धारण नही किए है ,वो समझेगे ?
बताओ रामखिलावन
रामखिलावन चुप्पी साध लिए ,कौन इस नमूने के मुह लगे
बलभद्र ,रामखिलावन की चुप्पी तोड़ने की नाकाम कोशिश करते रहे ,पर रामखिलावन तो रामखिलावन ,चुप ,तो चुप समझदार के लिए तो इशारा ही काफी है
ऐसा राम खिलावन का सोचना है
वैसे आप जो चाहे सोचे ,सोचे या नोचे राम खिलावन के चिंतन के चिंतन को कोई खलल नही पड़ता
रामखिलावन सोच रहा है की खुदा ने, भगवान ने ,परवरदिगार ने जिसने भी हमें इस लोक में भेजा है पता नही ,पर मानव बना कर ही भेजा और हम क्या बन गए ,यदि मानव बने रहते तो मानव धर्म ही निभाते ,रामखिलावन की जासूसी निगाहे सब देख रही है की कौन मानव है और कौन दानव
रामखिलावन सोच रहा है जो मानव बन कर अवतरित हुए थे और दानव बन गए है और वे दानव धर्म निभा रहे है तो कोई बात नही ,पर ,यदि आप ,अपने आप को मानव समझ रहे है और धर्म निभा रहे है दानव का तो क्या कहने ,हर हर गंगे
रामखिलावन यह भी जनता है की अब तो दानव पैदा ही नही हो रहे है द्वापर,त्रेता होता तो कहा भी जा सकता था अब तो केवल मानव ही पैदा हो रहे है और धर्म निभा रहे है .............................?का
रामखिलावन का चिंतन यही है की क्या हम मानव होते हुए मानव धर्म निभा रहे है ?
निभा रहे है तो जय हो जय हो नही तो --------------------?
रामखिलावन का चिंतन जारी है
Thursday, June 11, 2009
राम खिलावन हाजिर हे.
राम खिलावन आज नहा धो कर तरोताजा तरबूज की तरह महकते मंद मंद मुस्कुराते ओसारी के नीचे खटिया में पड़े `कुछ ' सोच रहे थे क्या सोच रहे थे वो सोच रहे थे की ये कुछ है क्या बला?जब भी कोई लफडा होता है या न भी ho सामान्य रूप से भी तो भी सब यही कहते कुछ तो है,इसी कुछ को राम खिलावन खोज रहा है की कैसे मिलेगा कुछ मिलेगा तो पुछुगा की तू है क्या बे ?राम खिलावन की यह धारणा है की स्रास्टी के उत्पन होने के पीछे भी कुछ तो रहा होगायही कुछ आज राम किलावन का दिमाग ख़राब किए है
ये कुछ ,जो है निराकार है वह कही भी बिना स्वरुप के होता है पर उसे लगता है की बिना आकार के,स्वरुप के वह हो कैसे सकता है भगवान है क्या ?नही कटाईकुछ न कुछ तो है पर ,साला दिखता नही है जैसे हवा,ये भी तो कहा दिखती है,पर रहती है ,चलती है महसूस होती है फ़िर सोचता है की हवा तो प्रकति का हिस्सा है तो क्या यह मान लिया जाए की कुछ भी प्रकृति का हिस्सा है राम खिलावन सोच रहा था की यह क्या अजन्मा है ,इसकी कोई भोतिक काया भी नही दिखती है की गला पकड़ लू और पुछू की क्यो बे तू है क्या ?राम खिलावन इतना तो समझा गया था की कुछ तो लफडा है कुछ के साथ तभी तो दिखता नही फ़िर सोचने लगा की भगवान भी तो नही दिखता ,परवरदिगार खा छिपे हो ,मोहन प्यारे दर्शन दो घनस्याम मोरी अखिया प्यासी रे ............पर खा प्यास बुझती है जिनकी प्यास बुझानी थी द्वापर ,त्रेता में बुझ गई अब तो रटते रहो प्यारे मोरी अखिया प्यासी रे ,प्यासी ही रहेगी अखिया इन अखियो से जब तक कुछ को नहीं लोंगे कुछ भी नहीं मिलेगा समझे
कल ही कोई ख रहा था की रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे के साथ भाग गई ,पास में खड़े बलभद्र जिन्हें बिना बोले रहा नहीं जाता ,अपच की बीमारी से ग्रसित है कुछ रहा होगा ,तभी तो भागी है कुछ न होता तो क्यो भागती भला राम खिलावन सोचने लगा मतलब कुछ लड़कियों को भगाने में अपना योगदान देता है ये तो बडा लफडे वाला लगता है क्या किया जाए कुछ के लिए कुछ करना पड़ेगा ऐसा मन राम खिलावन का हो रहा था वे चुपचाप इसी mishan में लगे है की कुछ मिले तो कुछ करे pahale तो कुछ को दे marege फ़िर कुछ karege पर जब मिले tab na
ramkhilavan का कुछ को ले कर vichalan swabhavik है manav है आप जैसा नहीं की कुछ को dudane की कोशिश क्या सोचते भी नहीं है आप अकेला ramkhilavan क्या डूड payega कुछ को ,कुछ तो tamam bagra है पर पकड़ में नहीं आ रहा है यही तो smasya है,बलभद्र के ऊपर से तो उसका vishvas tb से ud गया जब से उसने कहा था की रघुवंस की बिटिया भागने में भी कुछ था tb भी उसने उसे पकड़ा नहीं पकड़ लेता कुछ karata चाहे न मेरे पास तो lata फ़िर में dekhata उस कुछ को पर नहीं bolege jarur कुछ था ,कुछ है पर pakadege नहीं मेरे पास layege नहीं सब sale कुछ से मिले jule है ऐसा लगता है
कभी कभी ramkhilavan यह भी सोचता है की कही कुछ लोग कुछ के पीछे तो नहीं पड़े है hath धो के कुछ karata चाहे कुछ भी न हो और ये सब कुछ का नाम ले कर उसे badanam कर रहे हो ramkhilavan chintak की mudra में kafi देर तक इसी bat पर चिंतन करते रहे ,chinta तो वे करते नहीं ये आप भी jante है क्यो की chaturai ghatati है
कुछ तो कुछ है पर ये वही janate है जिन्हें कुछ कुछ होता है आप को हुआ है क्या ?कुछ कुछ ramkhilavan यह सोचता है की ये कुछ कुछ कैसा होता है ?आकार लिए होता है या फ़िर निराकार ही होता है वह यह भी सोच रहा है की कुछ और कुछ में अन्तर होता है ऐसा aabhash उसे हुआ और वह achakchiya के ud baida की are कुछ है वह उसे dudane लगा khub duda पर मिला नहीं ,ये कुछ भी क्या bla है ,है भी ,पर है भी नहीं
baharhal राम खिलावन कुछ को खोजने में prayasrat है जिन्हें उनके bap भी नहीं खोज paye पर ramkhilavan का कुछ पे चिंतन jari है
ये कुछ ,जो है निराकार है वह कही भी बिना स्वरुप के होता है पर उसे लगता है की बिना आकार के,स्वरुप के वह हो कैसे सकता है भगवान है क्या ?नही कटाईकुछ न कुछ तो है पर ,साला दिखता नही है जैसे हवा,ये भी तो कहा दिखती है,पर रहती है ,चलती है महसूस होती है फ़िर सोचता है की हवा तो प्रकति का हिस्सा है तो क्या यह मान लिया जाए की कुछ भी प्रकृति का हिस्सा है राम खिलावन सोच रहा था की यह क्या अजन्मा है ,इसकी कोई भोतिक काया भी नही दिखती है की गला पकड़ लू और पुछू की क्यो बे तू है क्या ?राम खिलावन इतना तो समझा गया था की कुछ तो लफडा है कुछ के साथ तभी तो दिखता नही फ़िर सोचने लगा की भगवान भी तो नही दिखता ,परवरदिगार खा छिपे हो ,मोहन प्यारे दर्शन दो घनस्याम मोरी अखिया प्यासी रे ............पर खा प्यास बुझती है जिनकी प्यास बुझानी थी द्वापर ,त्रेता में बुझ गई अब तो रटते रहो प्यारे मोरी अखिया प्यासी रे ,प्यासी ही रहेगी अखिया इन अखियो से जब तक कुछ को नहीं लोंगे कुछ भी नहीं मिलेगा समझे
कल ही कोई ख रहा था की रघुवंस दुबे की बिटिया हरिहर के लौडे के साथ भाग गई ,पास में खड़े बलभद्र जिन्हें बिना बोले रहा नहीं जाता ,अपच की बीमारी से ग्रसित है कुछ रहा होगा ,तभी तो भागी है कुछ न होता तो क्यो भागती भला राम खिलावन सोचने लगा मतलब कुछ लड़कियों को भगाने में अपना योगदान देता है ये तो बडा लफडे वाला लगता है क्या किया जाए कुछ के लिए कुछ करना पड़ेगा ऐसा मन राम खिलावन का हो रहा था वे चुपचाप इसी mishan में लगे है की कुछ मिले तो कुछ करे pahale तो कुछ को दे marege फ़िर कुछ karege पर जब मिले tab na
ramkhilavan का कुछ को ले कर vichalan swabhavik है manav है आप जैसा नहीं की कुछ को dudane की कोशिश क्या सोचते भी नहीं है आप अकेला ramkhilavan क्या डूड payega कुछ को ,कुछ तो tamam bagra है पर पकड़ में नहीं आ रहा है यही तो smasya है,बलभद्र के ऊपर से तो उसका vishvas tb से ud गया जब से उसने कहा था की रघुवंस की बिटिया भागने में भी कुछ था tb भी उसने उसे पकड़ा नहीं पकड़ लेता कुछ karata चाहे न मेरे पास तो lata फ़िर में dekhata उस कुछ को पर नहीं bolege jarur कुछ था ,कुछ है पर pakadege नहीं मेरे पास layege नहीं सब sale कुछ से मिले jule है ऐसा लगता है
कभी कभी ramkhilavan यह भी सोचता है की कही कुछ लोग कुछ के पीछे तो नहीं पड़े है hath धो के कुछ karata चाहे कुछ भी न हो और ये सब कुछ का नाम ले कर उसे badanam कर रहे हो ramkhilavan chintak की mudra में kafi देर तक इसी bat पर चिंतन करते रहे ,chinta तो वे करते नहीं ये आप भी jante है क्यो की chaturai ghatati है
कुछ तो कुछ है पर ये वही janate है जिन्हें कुछ कुछ होता है आप को हुआ है क्या ?कुछ कुछ ramkhilavan यह सोचता है की ये कुछ कुछ कैसा होता है ?आकार लिए होता है या फ़िर निराकार ही होता है वह यह भी सोच रहा है की कुछ और कुछ में अन्तर होता है ऐसा aabhash उसे हुआ और वह achakchiya के ud baida की are कुछ है वह उसे dudane लगा khub duda पर मिला नहीं ,ये कुछ भी क्या bla है ,है भी ,पर है भी नहीं
baharhal राम खिलावन कुछ को खोजने में prayasrat है जिन्हें उनके bap भी नहीं खोज paye पर ramkhilavan का कुछ पे चिंतन jari है
Wednesday, June 10, 2009
राम खिलावन हाजिर है
राम खिलावन शहर की आवोहवा से परेसान हो सड़क का किनारे बैठा सोचा रहा था कि,क्या किया जाए इस समस्या से कैसे निजात पाई जाए, जब की सही यह है की उसके बाप को भी पता नही है कि शहर कि आवोहवा को , कैसे ठीक किया जाए किनारे लगे नल में पानी नही आ रहा था कि वह पानी ही पी ले और व्यवस्था के विरोध में उठते ज्वार भाटे को शांत कर ले इतने में ए़क भट सूअर ठेर सारा धुँआ उसके पास छोड़ कर अपनी रफ्तार से मंजिल कि और बठा चला गया ,इस अनचाहे धुएं ने रामखिलावान कि सोच में खलल दल दिया ,उसके मुह से गाली निकलने ही वाली थी लेकिन यह सोच कर नही निकल पाई कि साला सुनेगा कौन राम खिलावन के लिए साला कोई गली नही मात्र संबोधन है जिसे वे कभी भी किसी के लिए निसंकोच उपयोग कर लेते है
राम खिलावन सोच रहे थे कि नल है मगर पानी नही आ रहा ,अस्पताल है पर डाक्टर नदारत है कम्पौंदर ही डाक्टर बने बैठे है और मरीजो को टंच कर रहे है दोनों मरीज और कम्पौंदर भ्रम में जी रहे है कम्पौदर सोच रहा है कि मै डॉक्टर से कम नही और मरीज सोच रहा है कि मै कम्पौदर साहब कीलिखी दवाओ के असर से ठीक हो गया हूस्कुल है पर मास्टर नही आता ,गुरु जी है लौडो को क्या पठा रहे है उन्हें ख़ुद ही पता नही गुरु जी है ,पालनहारा की यह अनुपम कृति है ,उपहार है ,प्रदेश के नौनिहालों के लिए गुरु जी ,जो ज्यादातर अपने को नियमित करने और वेतन के अड़पेचो के सुधारवादी कार्यक्रम में लगे रहते है और फ़िर,जब भी वक्त मिलता है स्कुल का चक्कर लगा आते है
क्या होगा इस देश का प्रदेश का ? रामखिलावन शहर की एक सड़क के किनारे पद्माशन की मुद्रा में बैठ इस गूढ़ रहस्य को समझने की बलात कोशिश कर रहे थे कही देश,हिंद महा सागर नही डूब जाए इस तरह की अव्यव्स्थाओ के चलते प्रदेश तो डूब ही नही सकता क्यो की सागर बहुत दूर है देश के डूबने के चांसेज ज्यादा है फ़िर वह सोचने लगा की यदि देश डूबेगा तो प्रदेश भी तो डूबेगा क्या वह चड्डी पहने किनारे खड़ा रहेगा फ़िर वह सोचने लगा की हिंद देश, यदि डूबा भी तो हिंद महा सागर में ही तो डूबेगा वह भी तो अपना ही है ,किसी दुसरे सागर में तो डूबने जाएगा नही क्यो की वो सब दूर है अपना ,अपने में ही तो डूब रहा है इससे अच्छी बात और क्या हो सकती भगत भगवान से मिले या भगवान भगत से बात तो एक ही हैपर उसने सुन रखा था की कृष्ण की द्वारका वाकई में समुन्द्र में समाहित हो गई है कही ऐसा हुआ है तो क्या यह मन लिया जाए की उस समय भी इसी प्रकार की अव्यवास्थाओ के चलते जैसा मै सोच रहा हू हुआ होगा
राम खिलावन ने अपने को वैचारिक घालमेल में फसता देख और विचलित हो गया तब तक एक कनखजूरा उसके अर्ध नग्न शरीर में फसे कपड़ो के भीतर पता नही कहा से बिना पूछे घुस गया ;घुसा तो घुसा कोई बात नही ,झाड़ पोछ कर राम खिलावन फारिग हो जाते पर इस कनखजूरे ने तो बिना पूछे कस कर कट भी लिया ,राम खिलावन बिलबिला पड़े ;और एक छुट्टा गाली देते हुए कनखजूरे को बाहर निकाल फेका तबियत से उसकी चटनी बना दी ,कनखजूरा वीरगति को प्राप्त हो गया ,तब राम खिलावन को चैन मिला
ऐसे अप्रासंगिक छडो को छोड़ कर राम खिलावन का स्वभाव चिन्तक का है वे मूलतः चिन्तक ही है आप सोच रहे होंगे की चिन्तक शासकीय, अर्धशासकीय, नय्नाविराम इमारतो ,सरकारी बंगलो या टोपी तप लगाये दाठी बढाये झुके कंधो में झोला लटकाए या काफी हाउस में चार घंटे के हिसाब से चार बार काफी पीने वाले या चमचमाती कार में सत्ता के इर्द गिर्द चक्कर लगाते पाए जाते है तो आप ग़लत है राम खिलावन आपको ,आप के आस पास कही भी मिल जाएगा ;चिन्तक की मुद्रा में ,देखे तो सही हा, राम खिलावन को देखने के लिए आखे चाहिए बटन नही
राम खिलावन एक अधभुत प्राणी है वो चिंता नही चिंतन में विश्वास रखता है ,क्यो की उसे मालूम है की चिंता करने से चतुराई घटती है और चुतियाई बढ़ती है और आप जान ,की राम खिलावन को चुतियाई से बड़ा parhej है ,उसी तरह जय से madhumeh के मरीज को gulguley से ये बात अलग है की चोरी छिपे kha ही लेते है ,वैसे ही राम खिलावन भी कभी कभी दिल bahlane के लिए chutiyai कर ही bhaithate है
baharhal अभी तो राम खिलावन के चिंतन का विषय शहर की aavohawa को कैसे badala जाए ,है जिसे उसके बाप भी नही badal पाए ,खैर चिंतन jari है
राम खिलावन सोच रहे थे कि नल है मगर पानी नही आ रहा ,अस्पताल है पर डाक्टर नदारत है कम्पौंदर ही डाक्टर बने बैठे है और मरीजो को टंच कर रहे है दोनों मरीज और कम्पौंदर भ्रम में जी रहे है कम्पौदर सोच रहा है कि मै डॉक्टर से कम नही और मरीज सोच रहा है कि मै कम्पौदर साहब कीलिखी दवाओ के असर से ठीक हो गया हूस्कुल है पर मास्टर नही आता ,गुरु जी है लौडो को क्या पठा रहे है उन्हें ख़ुद ही पता नही गुरु जी है ,पालनहारा की यह अनुपम कृति है ,उपहार है ,प्रदेश के नौनिहालों के लिए गुरु जी ,जो ज्यादातर अपने को नियमित करने और वेतन के अड़पेचो के सुधारवादी कार्यक्रम में लगे रहते है और फ़िर,जब भी वक्त मिलता है स्कुल का चक्कर लगा आते है
क्या होगा इस देश का प्रदेश का ? रामखिलावन शहर की एक सड़क के किनारे पद्माशन की मुद्रा में बैठ इस गूढ़ रहस्य को समझने की बलात कोशिश कर रहे थे कही देश,हिंद महा सागर नही डूब जाए इस तरह की अव्यव्स्थाओ के चलते प्रदेश तो डूब ही नही सकता क्यो की सागर बहुत दूर है देश के डूबने के चांसेज ज्यादा है फ़िर वह सोचने लगा की यदि देश डूबेगा तो प्रदेश भी तो डूबेगा क्या वह चड्डी पहने किनारे खड़ा रहेगा फ़िर वह सोचने लगा की हिंद देश, यदि डूबा भी तो हिंद महा सागर में ही तो डूबेगा वह भी तो अपना ही है ,किसी दुसरे सागर में तो डूबने जाएगा नही क्यो की वो सब दूर है अपना ,अपने में ही तो डूब रहा है इससे अच्छी बात और क्या हो सकती भगत भगवान से मिले या भगवान भगत से बात तो एक ही हैपर उसने सुन रखा था की कृष्ण की द्वारका वाकई में समुन्द्र में समाहित हो गई है कही ऐसा हुआ है तो क्या यह मन लिया जाए की उस समय भी इसी प्रकार की अव्यवास्थाओ के चलते जैसा मै सोच रहा हू हुआ होगा
राम खिलावन ने अपने को वैचारिक घालमेल में फसता देख और विचलित हो गया तब तक एक कनखजूरा उसके अर्ध नग्न शरीर में फसे कपड़ो के भीतर पता नही कहा से बिना पूछे घुस गया ;घुसा तो घुसा कोई बात नही ,झाड़ पोछ कर राम खिलावन फारिग हो जाते पर इस कनखजूरे ने तो बिना पूछे कस कर कट भी लिया ,राम खिलावन बिलबिला पड़े ;और एक छुट्टा गाली देते हुए कनखजूरे को बाहर निकाल फेका तबियत से उसकी चटनी बना दी ,कनखजूरा वीरगति को प्राप्त हो गया ,तब राम खिलावन को चैन मिला
ऐसे अप्रासंगिक छडो को छोड़ कर राम खिलावन का स्वभाव चिन्तक का है वे मूलतः चिन्तक ही है आप सोच रहे होंगे की चिन्तक शासकीय, अर्धशासकीय, नय्नाविराम इमारतो ,सरकारी बंगलो या टोपी तप लगाये दाठी बढाये झुके कंधो में झोला लटकाए या काफी हाउस में चार घंटे के हिसाब से चार बार काफी पीने वाले या चमचमाती कार में सत्ता के इर्द गिर्द चक्कर लगाते पाए जाते है तो आप ग़लत है राम खिलावन आपको ,आप के आस पास कही भी मिल जाएगा ;चिन्तक की मुद्रा में ,देखे तो सही हा, राम खिलावन को देखने के लिए आखे चाहिए बटन नही
राम खिलावन एक अधभुत प्राणी है वो चिंता नही चिंतन में विश्वास रखता है ,क्यो की उसे मालूम है की चिंता करने से चतुराई घटती है और चुतियाई बढ़ती है और आप जान ,की राम खिलावन को चुतियाई से बड़ा parhej है ,उसी तरह जय से madhumeh के मरीज को gulguley से ये बात अलग है की चोरी छिपे kha ही लेते है ,वैसे ही राम खिलावन भी कभी कभी दिल bahlane के लिए chutiyai कर ही bhaithate है
baharhal अभी तो राम खिलावन के चिंतन का विषय शहर की aavohawa को कैसे badala जाए ,है जिसे उसके बाप भी नही badal पाए ,खैर चिंतन jari है
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