Sunday, February 14, 2010

फागुन आया गाव में



फागुन आया गाव में , लोग रंग बिरंगे हो,

बिना किसी बात के ठिठौलिया कर रहे है और

गाव की गोरी टेसू के फूल की तरह शुर्ख लाल हो चली गेहू की बालियों की खुशबू माहौल को मादक बना दूर बैठे पीहर जाने को उतावली है

जरा गाव की तरफ आओ तो बिना भींगे रहोगे नहीं ,

जीवन में रंगों का अपना महत्व है बिना रंगों का जीवन भी क्या जीवन है

भदरंग जिंदगी जीते जीते मन भरा नहीं क्या अभी तुम्हारा की फागुन का नाम आते ही मुह बिचकाने लगे भूल गए वो बचपन के दिन जब सुबह से ही रंगों की पिचकारी लिए दौड़ते थे फुदकते थे और फिर रंग कर चिल्लाते थे होली है ..........होली है ...........वो गुझिया और मठरी रंगे हाथो से खाना भूल गए बड़े भुल्लकड़ हो यार तीस चालीस सालो में कितना बदल गए तुम वो पड़ोस की लड़की जिसके गालो में गुलाल मलना तुम अपना परम धर्म समझते थे कहा

है वो आज कल कुछ पता है तुम्हे ............?

सुनो ,इस ब्रम्हांड में जिंदगी के अलावा और कुछ नहीं है कपडे बदलने में तो तुम्हे कभी हिच्च नहीं होती है फिर मौत से क्यों हिच्च ............

रंगों का अपना संसार है अपने सपने है रंग भला किसे नहीं अच्छे लगते तुम्हे कैसे लगते है रंग ,रंगों में भी कौन सा रंग तुम्हे भाता है कुछ है या फिर बस यू ही भदरंग भदरंग छिता कसी ...........कर और सोच क्या रहे प्रेरणा प्रेरणा ,प्रेरणा प्रेरणा वे वो भी वो वो फग गद्ग दगड द्फ्द द्ग्फ्द फड द्ग्फ़ वो औरवो झ्फ्झ ह्फ्ज्द क्स्झ वेफर रर

केs लिए पड़ोस की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है देख रेख भी ठीक रहती है ज्यादा भाग दौड़ की भी जरुरत नहीं होती , जब मन आया खेती देख ली

पड़ोस के लहलहाते खेत को देख दूसरो को भी प्रेरणा मिलती है ओर वो भी अपने पड़ोस की उसर जमीन को
उपजाऊ बनाने की जुगत में लग जाते और यदा कदा खेती भी लहलहाने लगती ,पड़ोस की जमीन जो प्रेम के लिए उपजाऊ होती
हम सब किस मिट्टी के बने है की जुड़ने की नाम ही नहीं लेते टूटने और तोड़ने में विश्वास रखते है जो आनद जुड़ने और जोड़ने में है वो तोड़ने और टूटने में नहीं ,होली जुड़ने और जोड़ने की त्यौहार है मस्ती और उमंग का उत्सव है
प्यार और उल्लास का दिन है जीवन का हर दिन होली हो हर शाम दिवाली हो ,त्योहारों को तारीखों में मत बंधो ,जीवन सरल है सहज है इसके रंगों में रंग जाओ सूरज को अपनी मर्जी से मत उगाओ नहीं उगेगा निराश हो जाओगे और निराश निराश मिट जाओगे ..... फागुन में रंग खेलो और रंगों लोगो को ,पड़ोस की वो लड़की अब कहा है जरा खोजने की कोशीश करो मिल जाये तो खबर करना ..............


Tuesday, February 2, 2010

छोटा सा गाव


मेरा गाव बहुत छोटा सा है, बिलकुल छोटा सा' लोग घर में नहीं दिलो में रहते है चाँद ,तारे ,सूरज ,पेड़ ,पौधे ,हरियाली , कुआ ,पानी ,पनघट ,पगडण्डी, गाय,गोबर ,गौधुली ,छाया ,धूप ,अमराई ,वो सब कुछ है वहा जो होना चाहिए प्रेम ,आदर, भावनाए ,सम्मान ,आतिथ्य
वहा आपको आपका खोया हुआ मन मिलेगा ,किसी झुरमुट से लिपटा ,आपको देख फिर आपके साथ हो लेगा ,
जिन्हें आप खोज रहे है वो भी मिल सकता है अगर नजरे हुई तो

Thursday, January 28, 2010

झंडा ऊँचा रहे हमारा ...............



बैकुंठी में झंडा रोहन

Tuesday, January 19, 2010

कहो कैसे हो

कैसे है आप और आपके अपने ,अपनापन बनाये रखे यही है बिंदु जो जोड़े रहता है माला में मोतियों को धागा ही एक दुसरे को आपस में पिरोये रहता है ,लेकिन दिखता नहीं है ,मोती भर एक दुसरे के साथ गुथे दिखाई देते है ,माला से धागा टूट जाये तो सारे मोती बिखर जाते है ,मोती तो अलग अलग है ही साथ रखने की काम तो धागा करता है ,हम सब अलग अलग तो है ही एक साथ पिरोने की काम अपनापन रूपी धागा ही करता है ,अपनापन रूपी धागा टूटने न पाए नहीं तो सब बिखर जायेंगे ,बिखरे की, ख़तम खेल ,गयी भैस पानी में फिर भैस को पानी से निकालना सब के बस की बात नहीं ,चरवाहा ही निकाल पायेगा वो भी निपुण और जो भैसों के स्वभाव से परिचित हो अपना हो अपनापन हो ,फिर वही अपनापन
अपनेपन की डोर ,तार जुड़े है दोनों और जिनका कोई ओर न छोर
यदि मै उसको अपना कहता तो फिर कौन तुम्हारा होगा
क्या मुझको क्या तुम्हे मिलेगा यदि उसका बटवारा होगा
जो मेरा है वही तुम्हारा बोलो अब क्या प्रशन शेष है
मत जीवन की करो कल्पना देखो कितनी सास शेष है
गत तो गत है आगत को मै देखा देखा रहा टकटकी लगाये
किसी तरह यदि दिन बिता तो देखो कितनी रात शेष है .......
मत जीवन की करो कल्पना देखो कितनी सास शेष है .............
बची हुई सासे कितनी है न तुम्हे मालूम है न हमें
फिर ............

Tuesday, November 17, 2009

गाँव


Monday, November 16, 2009

तुम्हारे लिए

गाव के छाया चित्र आपको क्या सोचने के लिए कहते है भोर की अंगड़ाई मोह पाश में बाधने के लिए बुला रही है बिना किसी राग द्वेष के तुम्हारी भूली बिसरी यादो के साथ आवाज दे रही है देखो तुम कहा भटक गए ,निर्मल मन अब कितना निर्मल रहा ,तुम ऐसे क्यो हो गए ,क्या पाने के जुगत में तुमने अपनी काया माया को इतना गिरा दिया या उठा लिया की अब वास्तविकता से कोषो दूर हो गए
घर लौटने की तैयारी नही करोंगे ,क्या घर नही लौटना है ,कोई हमेशा यहाँ नही रहा है तो फ़िर तुम क्या रहोंगे ,फ़िर भी ,कोई तैयारी नही ,तुम्हे याद होगा तुमने परिझाओ की माकूल तैयारिया की थी सो हमेशा पास होते रहे और हर ऐसी तैयारिया तुम करते रहे हो जिससे आज इस मुकाम तक सफलता पूर्वक पहुचे ,फ़िर घर लौटने की तैयारी क्या तुम नही करोंगे ,उसकी भी तो तैयारी करनी होगी ,कब करोंगे ,बिना तैयारी के क्या घर लौटने का इरादा है ,यदि ऐसा हो तो फ़िर कोई बात ही नही , अगर नही तो फ़िर शुरू करो घर लौटने की तैयारी देखो कितना आनंद आता है ,
जिंदगी के साथ साथ और जिंदगी के बाद भी
लोगो को 'बड़ा भ्रम है की जिंदगी के बाद भी क्या जिंदगी है ,कितनी सरल बात को भी लोग कितना कठिन बनाये हुए है ,हम घर से दस बजे आफिस जाते है और पांच बजे आफिस से घर वापस आते है तो क्या जीवन दस और पाच के बीच ही है क्या ? जीवन दस बजे के पहले और पांच बजे के बाद भी है इसी प्रकार जीवन जनम से पहले और म्रत्यु के बाद भी है ......................
आ अब लौट चले .......................................

तुम्हारे लिए