तारो की बारातों वाला गाँव ,यादो की बारातों वाला गाँव
नानी की कहानी वाला गाँव, काका के ककहरा वाला गाँव
नीम की निबौनी वाला गाँव, आँगन ओ ओसारी वाला गाँव
कीचड़ ओ कांदो वाला गाँव, नदियां में नावों वाला गाँव
महुआ ओ आमो वाला गाँव, खेत ओ खलिहानो वाला गाँव
पूजा ओ परछन वाला गाँव, तीज ओ त्योहारों वाला गाँव
मेल ओ मनुहारो वाला गाँव, छंद ओ मकरंद वाला गाँव
हँसी ओ ठिठौली वाला गाँव, झगडे ओ झासें वाला गाँव
पंच ओ परपंचो वाला गाँव, नेग ओ विदाई वाला गाँव
चौपड ओ चौपाल वाला गाँव, पान ओ पतौखी वाला गाँव
नन्द ओ भौजाई वाला गाँव, दिया ओ बाती वाला गाँव
ज्योनार ओ बियारी वाला गाँव, मस्ती ओ हुडदंग वाला गाँव
आदर ओ सम्मान वाला गाँव, नेह ओ स्नेह वाला गाँव
दुःख ओ सुख वाला गाँव, शेर ओ शियार वाला गाँव
भाजी ओ बरी वाला गाँव, बगिया ओ चिरईया वाला गाँव
बेला ओ करौदो वाला गाँव, ताल ओ तलईया वाला गाँव
नइहर ओ पीहर वाला गाँव ,मेध ओ बदरी वाला गाँव
धूल ओ पगडंडी वाला गाँव ,धूप ओ जाड़े वाला गाँव
साँझ ओ भिनसारे वाला गाँव, चाँद ओ सूरज वाला गाँव
तारो की बरतो वाला गाँव , बोलता प्रतीकों वाला गाँव
Saturday, August 21, 2010
महुआ हो गया मन .........
फागुन आया गांव में महुआ हो गया मन
अमलतास की डाल से बोले हीरा मन
अभी अभी तो पास थे अभी अभी है दूर
मन से अब भी पास है तन से कोशो दूर
छिप छिप कर मिलते रहे अब तक कितनी बार
गुलमोहर की छाव में पकड़ गए कचनार
गली गली में राधाये गली गली में कृष्ण
मन ही मन उत्तर मिले नही पूछने प्रश्न
वैसे तो सब भूल गए फिर भी है कुछ याद
झरने जैसी थी हँसी मिसरी जैसी बात
अमलतास की डाल से बोले हीरा मन
अभी अभी तो पास थे अभी अभी है दूर
मन से अब भी पास है तन से कोशो दूर
छिप छिप कर मिलते रहे अब तक कितनी बार
गुलमोहर की छाव में पकड़ गए कचनार
गली गली में राधाये गली गली में कृष्ण
मन ही मन उत्तर मिले नही पूछने प्रश्न
वैसे तो सब भूल गए फिर भी है कुछ याद
झरने जैसी थी हँसी मिसरी जैसी बात
Thursday, August 12, 2010
झेलो झेलो .............
शनिचर कहते है, झेलना, मानव स्वभाव यदि मानव दानव न बन जाये तो वह अपने इस स्वाभाव को जन्म से म्रत्यु तक निभाता है अपनी स्वार्थ सिद्दी के लिए झेलना लाजमी भी है जैसे पैदल चलना टहलना स्वास्थ के लिए इन लोगो से जो घूमते टहलते है उनसे धीरे से पूछो तो जोर से बताते है ,घुमने ,टहलने केलाभ ,वे लगे हाथ बता देते है गुण भी कोई खूसट न हुआतोशनिचर कहते है यदि कोई जीवन भर पैदल चले /घुमे तो उसे बबासीर भी हो सकता है कभी अलग से शनिचर इस नाजुक विषय पर एवररेडी टार्च से प्रकाश डालेंगे
खैर चर्चा हो रही है झेलने पर ,रामखिलावन खटिया में अपनी चिरपरिचित मुद्रा में उतान पड़े है शनिचर प्रकास डाल रहे है बगल में बलभद्र उकडू विराजमान है तीनो की तिकड़ी के अलावा चौथे आप है ,तो सुनिए शनिचर क्या कह रहे है ,दादा हम अपने स्वभाव को कैसे बदल सकते है आम के पेड़ में जामुन कहा लगती है ,जिसका जो स्वभाव है उसी के अनुसार वह जीवन भर एक्ट करता है फिर मर मुरा जाता है चना मुर्रा की तरह हमारे यहाँ मानव नाम के प्राणी की बेधड़क पैदावार है बिना खाद पानी के अच्छी फसल तैयार हो जाती है लोग बाग़ इस विषय पर एक दुसरे को मदद करते भी देखे गए है शनिचर कहते है की मानव ,जीवन भर अपना धर्म निभाता है और निभाते निभाते ,निकल लेता है उसकी जगह कुछ और लोग पैदा हो जाते है म्रत्यु के डर से जन्म नहीं रुकते ऐसा शनिचर का कहना है
भारत भूमी में झेलने की प्रथा ,परम्परा युगों युगों से अहिर्निश चली आ रही है , जिसे हम आज भी निभा रहे है निभा इस लिए रहे है की न निभाने का दम नही है ,न निभाए तो निपूर न जाये ऐसा शनिचर कहते है आगे कहते है की हमने दुसरे रीति रिवाज संस्कार ,सभ्यता हिंद महा सागर में बड़ी सी चट्टान में बांध कर डूबा दिए है झेलने भर की प्रथा लिए हम घूम रहे है
यदि झेलने को खेल के रूप में लिया जाये और उसे कामनवेल्थ /ओलम्पिक आदि में खेला जाये तो हमे स्वर्ण के नीचे कोई पदक नही मिल सकता यह ध्रुव सत्य है झेलने ,झेलवाने में हमारा कोई सानी इस धरा पर नही धरा है शनिचर बोले
झेलने के लिए हम सदा सदा से सदैव तैयार रहते है झेलने के कण हमारे शरीर में हिमोग्लोबीन की तरह रहते है झेलने का हमारा गौरवशाली इतिहास रहा है जिसे हमने मेंटेन कर रखा है इतिहास के पन्ने पलटो पल्ट्टू राम झेलने की गौरव गाथाओं से भरे पड़े है झेलने की हमारी विरासत जो हमें मिली है ज्यो की त्यों हम देश की नई फसल को सौपने का विचार रखते है
आज के परिपेक्ष में जनता ,नेता जी को झेल रही है ,नेता जनता को एक दुसरे को दोनों समयानुसार सुविधानुसार झेल रहे है जनता महगाई झेल रही है ,देखिये जब एक रुपिया का दस सेर घी मिलता था तब भी वो महगा लगता था और अब जब पांच सौ रूपया का एक किलो मिल रहा है तो भी झेल रहे है अग्रेजो को भी खूब झेला इस देश ने आजादी के पहले ,एक भोले भंडारी है भगवान शंकर ,विष ही झेल गए ,झेलने में अमरत्व के गुण छिपे है ऐसा भी शनिचर कहते है कुछ लोग इसी लिए भी जीवन भर एक दुसरे को झेलते रहते है अमर तो होते नहीं मर जरुर जाते है इस चक्कर में
स्कुल में लौड़े मास्टर को झेल रहे है मास्टर लौड़ो को ,ऑफिस में अफसर ,मुलाजिमो को ,मुलाजिम अफसर को .कौन किसे और क्यों झेल रहा है ,कब से झेल रहा है ,कब तक झेलेगा बीच में पटक तो नहीं देगा ये सब शोध के विषय है शनिचर कहते है चोर पुलिस के साथ साथ उसके डंडे को भी झेल रही है एक साथ दो दो को ,कभी कभी इस देश में एक साथ कियो को झेलना पड़ता है ये तो भला हो की हम सब इसके आदी है नही तो बैंड बज जाये हमारी सड़के चालीस चक्के वाले ट्रेलर को झेलती है जनता गड्डो वाली सडक को
इस देश में हम शोकिया खेल खेल में कभी बाढ़ तो कभी सूखा कभी भूकम्प को भी झेलते है पहले पुरखे कहते है की हम लोग अपने जमाने में प्लेग ,हैजा ,चेचक ,टीवी और न जाने क्या क्या झेलते रहे है ,मतलब झेलने की हमारी स्वस्थ परम्परा रही है जिसे हम ज्यो का त्यों निभा रहे है
झेलना शाश्वत है हम और हमारा देश झेलने में विश्व में अपना एक अलग स्थान रखता है और अपने स्थान से हिलता डुलता भी नही है ,गुरुत्वाकर्षण के सिधान्तो का पालन करता है इस देश में जो जितना बड़ा झेलू उसका कद भी उतना बड़ा ,व्यक्तित्व विकाश के लिए झेलुपन एक अनिवार्यता है ,बिना इस गुण के आप इस देश में कुछ नही कर सकते विकसित नही हो सकते ,विकसित नही होगे तो पीछे राह जायेंगे कोई पीछे रहना नही चाहता इस युग में ,चठ बैठ रहे है जीवन की मैराथन में एक दुसरे पर
शनिचर कहते है झेलने से शांती बनी रहती है शांती में ही विकाश होता है जो छिपा है उसे बाहर निकलना है जो ठका है उसे उघाड़ना है ,जो बिना झेलने के सम्भव नही है सो हम झेल रहे है ............झेलो झेलो ............
खैर चर्चा हो रही है झेलने पर ,रामखिलावन खटिया में अपनी चिरपरिचित मुद्रा में उतान पड़े है शनिचर प्रकास डाल रहे है बगल में बलभद्र उकडू विराजमान है तीनो की तिकड़ी के अलावा चौथे आप है ,तो सुनिए शनिचर क्या कह रहे है ,दादा हम अपने स्वभाव को कैसे बदल सकते है आम के पेड़ में जामुन कहा लगती है ,जिसका जो स्वभाव है उसी के अनुसार वह जीवन भर एक्ट करता है फिर मर मुरा जाता है चना मुर्रा की तरह हमारे यहाँ मानव नाम के प्राणी की बेधड़क पैदावार है बिना खाद पानी के अच्छी फसल तैयार हो जाती है लोग बाग़ इस विषय पर एक दुसरे को मदद करते भी देखे गए है शनिचर कहते है की मानव ,जीवन भर अपना धर्म निभाता है और निभाते निभाते ,निकल लेता है उसकी जगह कुछ और लोग पैदा हो जाते है म्रत्यु के डर से जन्म नहीं रुकते ऐसा शनिचर का कहना है
भारत भूमी में झेलने की प्रथा ,परम्परा युगों युगों से अहिर्निश चली आ रही है , जिसे हम आज भी निभा रहे है निभा इस लिए रहे है की न निभाने का दम नही है ,न निभाए तो निपूर न जाये ऐसा शनिचर कहते है आगे कहते है की हमने दुसरे रीति रिवाज संस्कार ,सभ्यता हिंद महा सागर में बड़ी सी चट्टान में बांध कर डूबा दिए है झेलने भर की प्रथा लिए हम घूम रहे है
यदि झेलने को खेल के रूप में लिया जाये और उसे कामनवेल्थ /ओलम्पिक आदि में खेला जाये तो हमे स्वर्ण के नीचे कोई पदक नही मिल सकता यह ध्रुव सत्य है झेलने ,झेलवाने में हमारा कोई सानी इस धरा पर नही धरा है शनिचर बोले
झेलने के लिए हम सदा सदा से सदैव तैयार रहते है झेलने के कण हमारे शरीर में हिमोग्लोबीन की तरह रहते है झेलने का हमारा गौरवशाली इतिहास रहा है जिसे हमने मेंटेन कर रखा है इतिहास के पन्ने पलटो पल्ट्टू राम झेलने की गौरव गाथाओं से भरे पड़े है झेलने की हमारी विरासत जो हमें मिली है ज्यो की त्यों हम देश की नई फसल को सौपने का विचार रखते है
आज के परिपेक्ष में जनता ,नेता जी को झेल रही है ,नेता जनता को एक दुसरे को दोनों समयानुसार सुविधानुसार झेल रहे है जनता महगाई झेल रही है ,देखिये जब एक रुपिया का दस सेर घी मिलता था तब भी वो महगा लगता था और अब जब पांच सौ रूपया का एक किलो मिल रहा है तो भी झेल रहे है अग्रेजो को भी खूब झेला इस देश ने आजादी के पहले ,एक भोले भंडारी है भगवान शंकर ,विष ही झेल गए ,झेलने में अमरत्व के गुण छिपे है ऐसा भी शनिचर कहते है कुछ लोग इसी लिए भी जीवन भर एक दुसरे को झेलते रहते है अमर तो होते नहीं मर जरुर जाते है इस चक्कर में
स्कुल में लौड़े मास्टर को झेल रहे है मास्टर लौड़ो को ,ऑफिस में अफसर ,मुलाजिमो को ,मुलाजिम अफसर को .कौन किसे और क्यों झेल रहा है ,कब से झेल रहा है ,कब तक झेलेगा बीच में पटक तो नहीं देगा ये सब शोध के विषय है शनिचर कहते है चोर पुलिस के साथ साथ उसके डंडे को भी झेल रही है एक साथ दो दो को ,कभी कभी इस देश में एक साथ कियो को झेलना पड़ता है ये तो भला हो की हम सब इसके आदी है नही तो बैंड बज जाये हमारी सड़के चालीस चक्के वाले ट्रेलर को झेलती है जनता गड्डो वाली सडक को
इस देश में हम शोकिया खेल खेल में कभी बाढ़ तो कभी सूखा कभी भूकम्प को भी झेलते है पहले पुरखे कहते है की हम लोग अपने जमाने में प्लेग ,हैजा ,चेचक ,टीवी और न जाने क्या क्या झेलते रहे है ,मतलब झेलने की हमारी स्वस्थ परम्परा रही है जिसे हम ज्यो का त्यों निभा रहे है
झेलना शाश्वत है हम और हमारा देश झेलने में विश्व में अपना एक अलग स्थान रखता है और अपने स्थान से हिलता डुलता भी नही है ,गुरुत्वाकर्षण के सिधान्तो का पालन करता है इस देश में जो जितना बड़ा झेलू उसका कद भी उतना बड़ा ,व्यक्तित्व विकाश के लिए झेलुपन एक अनिवार्यता है ,बिना इस गुण के आप इस देश में कुछ नही कर सकते विकसित नही हो सकते ,विकसित नही होगे तो पीछे राह जायेंगे कोई पीछे रहना नही चाहता इस युग में ,चठ बैठ रहे है जीवन की मैराथन में एक दुसरे पर
शनिचर कहते है झेलने से शांती बनी रहती है शांती में ही विकाश होता है जो छिपा है उसे बाहर निकलना है जो ठका है उसे उघाड़ना है ,जो बिना झेलने के सम्भव नही है सो हम झेल रहे है ............झेलो झेलो ............
Thursday, July 29, 2010
क्या कहे ...........
जिन्हें मालूम नही है वे कहे जा रहे है और जिन्हें मालूम है या मालूम हो गया है वे चुप्पी साध लेते है |बकबक करने वालो की तादात देखे तो , कैसे बठती चली जा रही है | चारो तरफ ज्ञानियों की फौज जमी हुई है| बिना ज्ञान बघारे उन्हें नीद नही आती ,कब्ज हो जाये तो उसे भी लिए ज्ञान बाटने निकल पड़ते है गलियों गलियों | किसे सुधार रहे है |खुद क्या है |उस तरफ ध्यान नही है ये मनोदशा किसकी है और किसकी नहीं है ये शोध की विषय है |
घर -परिवार ,गाव ,कस्बा ,देश प्रदेश कहा कहा की बात करे ,नेता देश सुधारने में लगे है खुद बिगड़ जाये कोई हर्ज नही देश सुधार कर ही मानेगे |
कहने से कुछ होता है ,कुछ नही, बहुत कुछ होता है ,तुलसीदास की पत्नी ने ही उनसे कुछ कहा था जिससे वे रामभक्त हो गए ,कालिदास को भी ऐसे ही कुछ संकेत विध्योत्मा ने ही दिए थे ,पर क्या अब ऐसे कहने और सुनने वाले है ?
बात बात पर खुद को सही और दुसरे को गलत सिद्ध करने वाले हम और आप कभी अपना भी गिरेवान झांक कर देखते है ? कितनी तेजी से हम और हमारा देश उस दिशा की तरफ चल निकला है जिधर सम्मान नही है आदर ,सम्मान ,प्रतिष्ठा ,अपनापन ,प्रेम -व्यवहार ,तीज -त्यौहार ,नाते -रिश्ते ,भाषा -परिधान ,कला -संस्कृति , तान -बाणखान -पान ,पता नही सब कुछ बदला बदला सा है , मुझे तो ऐसे ही दिखता है हो सकता है मोतियाबिंद हो ,पर हो सकता ,आपको सही सही दिखता हो ?
परिवर्तन ही उन्नति है ,ऐसा शनिचर का कहना है ,आपका भी है या नहीं ,पता नहीं ,पर कैसा परिवर्तन ? आज लिया निर्णय कल सही होगा दावा नहीं कर सकते ,पर जब लेते है तो यह मन कर ही लेते है की सही निर्णय ही ले रहे है |वो आगे जा कर गलत साबित हो तो हम क्या करे ,सब कुछ अच्छे अच्छे के लिए तो करते है ,कौन गलत निर्णय लेता है वो तो समय है जो सही को गलत और गलत को सही साबित कर देता है फिर हम क्यों अपनी उर्जा दुसरे को गलत और अपने को सही लगाने में खर्च कर रहे है ?
शनिचर एक प्रार्थना गाते नहीं अघाते ,अब सौप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथो में ,है जीत तुम्हारे हाथो में और हार तुम्हारे हाथो में ......गुनगुनाते रहते है | सब की मालिक एक है तो फिर हम क्यों मालिक की रोल अदा करने में सर्री शक्ति भिडाये हुए है ,जब कुछ ले कर जाना नही है तो फिर इतनी माथा पच्ची क्यों काहे के लिए ,कहते है शांति नहीं रही ,अरे कहा से रहे और क्यों रहे ,उसे रहने के लिए जगह भी छोड़ी है की वह रहे ,हम फुल है जो नहीं है वो जुगाड़ में है फुल होने की ,मौका तलाश रहे है ,मौके का लाभ उठाने में भी हमारा कोई सानी नही ,फिर क्यों दुखी होते है हम | दुसरे के सुख को देख कर भी हम दुखी हो जाते है , सुख केवल अपने तक सियामित कर रखे है हमने ,जैसे ही तुम्हे सुखी देखते है दुखी हो जाते है हम | क्या करे दुसरे को देखना बंद कर दे .....|
जीवन गुजर रहा है और हम भी गुजर रहे है ,आम के पेड़ में आम ही फलते है सब ज्ञान हमें है बात यह नही है बात यह है की हम पाखंडी है मन से वचन से और कर्म से एक नहीं है ,मुह में राम बगल में छुरी कहावत आज बेतहासा फल- फूल रही है ,कब हम किसे डिच दे जाये हमें खुद पता नही ऐसा शनिचर की सोच है |
Thursday, July 8, 2010
डंडा पूरण-4
डंडे के स्वरुप और नाम को ले कर कुछ लोगो और क्षेत्रो में मतभेद उभारना स्वाभविक है ,ये देश भी तो ससुरा इतना बड़ा है कि कुछ दूर चलो नहीं कि बोली बदल जाती है और कुछ दूर चलो कि भाषा बदल जाती है कितनी बोली सीखे और कितनी भाषा ,हम तो दिए रहते है अपनी भाषा में प्रवचन जिन्हें समझ में आये वो समझ नहीं आये तो चुपचाप पालथी मार के बैठे ,चूचा न करे नहीं तो दिया ये चिमटा घुमा के शनिचर अपनी ओउकात में आ गए ,मुद्राए न बदलो नहीं तो फल नहीं मिलेगा पूरा पूरा ,फल के चक्कर में निपुर जाओ ,पर मुद्रा न बदलो ,शनिचर की नसी एक के ऊपर एक हो रही थी ,उसे लगा जैसे खून की आवागमन ही बंद प्राय हो गया है ,उसने हडबडा कर पाव सीधे किये ,उसके मन में चल रहा था कि ये कैसा गीता का ज्ञान है काम करो ,फल कि इच्झा न करो ,उसमे तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है ,मजूरी कौन देगा ,काम तो करे ,मजूरी न मांगे क्या बात है गीता का ज्ञान है कि भूखे मरवाने का हथकंडा किशन महराज ने भी कम लफड़े नहीं किये है का हमें मालूम नही , खैर चलता है कहा हम कहा प्रभु ,कहा राजा भोज कहा गंगू तेली ,पर है कुछ न कुछ .........जो केवल डंडे से ही ठीक किया जा सकता है इस लिए भैया डंडा पुराण सुन ही लेने भलाई है सो शनिचर फिर सुनने लगे .....
उधर रामखिलावन उवाच रहे थे ..हे श्रेठ नरो ,सुनो डंडा विहीन नर, नरक का भागी ही बनाने होता है मुसीबतों की पर्वत श्रख्लाये उसे उभरने नहीं देती वह उठ उठ कर भी जीवन भर गिरा रहता है डंडा ही उसे उठा सकने की ताकत रखता है और वह नर फिर डंडे की शरण में जाता है जिससे उसका उद्धार होता है
क्रमशः
Saturday, June 26, 2010
डंडा पुराण -3
खजुहा कुत्ताजो काफी देर से बदला लेने का इंतजार कर रहा था ,उसे मौका नहीं मिल रहा था सो इंतजार करते करते सो गया उधर डंडा पुराण फुल स्पीड में चालू था रामखिलावन बोले सुनो वत्स ............शनिचर के मुह से निकल गया सुनाओ अब तो थक गए पर धीरे से.......... आवाज ,प्रभु तक पहुचते पहुचते राह गयी नहीं तो एक नया बबाल और खड़ा हो जाता जो अभी बैठा था ,शनिचर वैसे भी बबाल मास्टर थे कही भी वे ,इस काम को अंजाम दे देते और खिसक लेते खैर .........
तब तक कुत्ता भी छपकी तोड़ ,मोड़ के बैठ गया , रामखिलावन बोले ,डंडा के कारन ही बुठापा कटता है ,डंडा बुठापे में सहारा होता है क्यों की कमर और किसी किसी के घुटने निपुर जाते है ,तब बस डंडा ही उन्हें अपना सहयोग देता है इस लिए हे वत्स जो विपत्ति में साथ खड़ा रहे ,उसकी महिमा तो अपरम्पार ही होगी कौन खड़ा होता है चलती बेरिया में सब उगते सूरज को सलाम करते है ,शंकराचार्य जैसे विद्वान डंडे के सहारे ही देश देशाटन करते थे ,देखा नहीं फोटुओ में बिना डंडे के शंकराचार्य को देखा है कभी ,ये बात अलग है की उसे दंड कहते है ,
क्रमश ................
तब तक कुत्ता भी छपकी तोड़ ,मोड़ के बैठ गया , रामखिलावन बोले ,डंडा के कारन ही बुठापा कटता है ,डंडा बुठापे में सहारा होता है क्यों की कमर और किसी किसी के घुटने निपुर जाते है ,तब बस डंडा ही उन्हें अपना सहयोग देता है इस लिए हे वत्स जो विपत्ति में साथ खड़ा रहे ,उसकी महिमा तो अपरम्पार ही होगी कौन खड़ा होता है चलती बेरिया में सब उगते सूरज को सलाम करते है ,शंकराचार्य जैसे विद्वान डंडे के सहारे ही देश देशाटन करते थे ,देखा नहीं फोटुओ में बिना डंडे के शंकराचार्य को देखा है कभी ,ये बात अलग है की उसे दंड कहते है ,
क्रमश ................
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