Wednesday, January 19, 2011

बहुत दिन बाद ........

राम खिलावन बहुत दिन बाद फिर आ गए ,मन भर गया इस चिल -पो से उनका ,बेसुरा गाना सब गए जा रहे है हर तरफ भ्रस्ताचार की बाते उसी के गीत उसी के नव गीत गाते लोग बैग नही अघा रहे है लितनी बाते करते है उतना ही वह सुरसा की तरह बठ्ता ही जा रहा है शायद गाने न गाने से न बठे ऐसा रामखिलावन का सोचना है ,वो कहते है की गए गए बियाह हो जाता है बलभद्र ,भ्रस्ताचार क्या चीज है जिसके बारे में हम सब ज्यादा सोचते है वही हमे सब तरफ दिखने लगती है ,प्रेम के किसी दीवाने से पुछो भईया उसे हर तरफ उसकी प्रेमिका ही दिखाई देती है हर जगह वह उसी की छवि देखता है उसी में सोता है और उसी में जागता है ,ऐसी ही कहानी कुछ -कुछ भ्रस्ताचार की है

तुम्हारा का कहना है बलभद्र महोदय , रामखिलावन खीस निपोरते हुए उनकी तरफ व्यंग बान मारते हुए बोले _ कुछ सकुचाते हुए भईया बलभद्र उवाचे ,दादा -जैसे हमारे विचार होते है वैसे ही हमारे आचार होते है जो आगे चल क्र अपनी प्रकृति के अनुसार सदाचार ,भ्रस्ताचार ,शिष्टाचार ,के नाम से जाना जाता है दादा समाज तो सामाजिक प्राणियों से मिल कर बनता है तो फिर यह असमाजिक चीज सामाजिक जगह कैसे घुस गयी शरणार्थियों की तरह ,लगता है इसमें भी कुछ विदेशी शक्तियों का हाथ है जैसे सब चीजों में प्रायः होता है या कहा जाता है ,हमारा देश तो महान है इस देश के नागरिक भी महान है ये गैर महान चीज कहा से पिल पड़ी निकल बाहर करो ससुरे को ,जाये जहा से आया है
कौन कहा से आया है और कौन किसे भागना चाहता है सब कुछ कल के गाल में समाया है पर हम बपुरे तो इसी चिल पो में पिसे जा रहे है

Tuesday, August 31, 2010

बादल आये गांव में .........

बादल आये गांव में , हुई खूब बरसात
दिन तो सारा भीग गया भीगी सारी रात
नीम निबौरी खिल उठे ऐसी थी सौगात
छानी छपर चूने लगे जह तह रखी परात
पोखर डबरे भर गये नदियां में थी बाढ़
छप छप करते आये ओढ़े शाल असाढ़
फुहारे जो रिमझिम रही बनी थी वो घनघोर
दिन भर बरसी सांझ हुई फिर होने को भोर
छाता ले मुनिया चली छप छप करते पांव
सारी धूल से धुल गया वो पुरखो वाला गांव
रात ओसारी में कटी दिन में पहुचे खेत
भिनसारे की ओठनी रही ओउघायी लेत






Tuesday, August 24, 2010

जीरो बटा सन्नाटा......

मनौतियो और मान्यताओ को ,लादे शनिचर जीवन भर चले पर भाग ना पंहुचा लधे शुन्य न कुछ ले के आये थे न कुछ ले के जायेंगे उनके मन में यह विचार आता है की ससुरे जीवन भर घास छिलते रहे का बड़े असमंजस में है चलती बेरिया करे तो करे का जो सुना -सुनाया, सुना ,उन्होंने जीवन भर ,सो किया अब उम्र जब, चला चली की हो चली तो लगे है हिसाब किताब करने , पर बार -बार करने पर भी उनका हिसाब किताब सब गड्डम- गुड्डा हो जाता है पिसाब जरुर निकल आता है इस मेहनत पर सो अलग समस्या है ..ससुरी बार बार जोडने घटाने के बाद भी हिसाब लध्धे शुन पर जा टिकता है शनिचर कनफुजिया गए है शनिचर हलकान है किससे चलती बेरिया पूछे पाछे बाल सखा जो रहे ससुरे पहले ही निपुर-निपुरा गए है जो एक दो बचे है कौनो काम के नही ,बिशेषर है कान का पर्दा फाड़े बैठे है साल भर से लौंडे है , उनके तीन धोऊ चार पर काहे को सुने कि बुठापे में कुछ सुभीता दे दे बाप को कहते है की बुठाईदार सुन सुना के का करेंगे कक्कू जीवन भर तो सुने नही किसी की अब जरा विश्राम कर ले हम सोच रहे है काहे को जाते जवाते राडी दुखाई सुने, यही सुभीता का कम है बताओ .....
शनिचर कहते है मान्यता , मतलब कुछ ऐसा झालाम्झाला ,धारणाये और अनुमान , कुछ ऐसी बाते जिनका सर पैर न हो पर जिस पर मन विश्वास करता है लेकिन जो सच न हो ,सच लगती भर हो क्योकि आस पास के सभी जन उन बातों पर विश्वास करते है सो देखा देखी हम भी करने लगते है मान्यता का अर्थ ही है जो नही है लेकिन हम सब मान लिए है मान्यता चोरकट है जाली है जो अज्ञान के अधेरे में चलता है ज्ञान के प्रकाश में नही
शनिचर ने इस चक्कर में जीवन भर भूले की अब चलाचली की बेला में हिसाब किताब सब गड्ड -मड्ड स्वर्ग नर्क की मान्यता जिसकी कोई भौगोलिक स्थिती नही है ,इस जन्म का फल अगले जन्म में मिलेगा ,सुख केवल अमीरो की बपौती है ,पैसा किस्मत से मिलता है ,पूजा न करेंगे तो भगवन नाराज हो जायेंगे फिर ले लेना बेट्टा सरस्वती जी घर घर पूजी जाती है पर नोबल पुरुस्कार पश्चमी देशो के नाम ,घर घर लक्ष्मी जी विराज मान है पर वो महरानी पाव तोड़ के अमरीका में बैठी है ....हम हिंदू ,मुसलमान सिख ,ईसाई की लड़ाई ही लड़ते रहे जीवन भर का मिला भैया .....
मूल मान्यता हम अपने आप को जीवन भर शरीर समझे रहे ,यह मेरा शरीर है ,यानी मै इससे अलग हुआ जब हमारे कपडे फट जाते है तब हम यह नही कहते की हम फट गए है लेकिन शरीर में दर्द होते ही कहते है दर्द हुआ यह है मूल मान्यता हम कपडे नही ,कपडे का उपयोग करने वाले है हम शरीर नही शरीर को चलाने वाले वाहक है ऐसी कुछ कुछ बाते शनिचर के मन में उपद्रव किये हुए है ,का करे किससे कहे और का कहे कोई इस भीड़ में सुनता नही दिखाई देता सब लगे है जीने में ,जीवन क्या है ,जीना क्या है वो ही जाने ...........शनिचर तो कहते है सब हिसाब किताब जीरो बट्टा सन्नाटा है भैया ..............

Saturday, August 21, 2010

तारो की बरतो वाला गांव

तारो की बारातों वाला गाँव ,यादो की बारातों वाला गाँव
नानी की कहानी वाला गाँव, काका के ककहरा वाला गाँव
नीम की निबौनी वाला गाँव, आँगन ओ ओसारी वाला गाँव
कीचड़ ओ कांदो वाला गाँव, नदियां में नावों वाला गाँव
महुआ ओ आमो वाला गाँव, खेत ओ खलिहानो वाला गाँव
पूजा ओ परछन वाला गाँव, तीज ओ त्योहारों वाला गाँव
मेल ओ मनुहारो वाला गाँव, छंद ओ मकरंद वाला गाँव
हँसी ओ ठिठौली वाला गाँव, झगडे ओ झासें वाला गाँव
पंच ओ परपंचो वाला गाँव, नेग ओ विदाई वाला गाँव
चौपड ओ चौपाल वाला गाँव, पान ओ पतौखी वाला गाँव
नन्द ओ भौजाई वाला गाँव, दिया ओ बाती वाला गाँव
ज्योनार ओ बियारी वाला गाँव, मस्ती ओ हुडदंग वाला गाँव
आदर ओ सम्मान वाला गाँव, नेह ओ स्नेह वाला गाँव
दुःख ओ सुख वाला गाँव, शेर ओ शियार वाला गाँव
भाजी ओ बरी वाला गाँव, बगिया ओ चिरईया वाला गाँव
बेला ओ करौदो वाला गाँव, ताल ओ तलईया वाला गाँव
नइहर ओ पीहर वाला गाँव ,मेध ओ बदरी वाला गाँव
धूल ओ पगडंडी वाला गाँव ,धूप ओ जाड़े वाला गाँव
साँझ ओ भिनसारे वाला गाँव, चाँद ओ सूरज वाला गाँव
तारो की बरतो वाला गाँव , बोलता प्रतीकों वाला गाँव

तारो की बारातों वाला गांव.......

तारो की बारातों वाला गाँव

यादो की बारातों वाला

महुआ हो गया मन .........

फागुन आया गांव में महुआ हो गया मन
अमलतास की डाल से बोले हीरा मन
अभी अभी तो पास थे अभी अभी है दूर
मन से अब भी पास है तन से कोशो दूर
छिप छिप कर मिलते रहे अब तक कितनी बार
गुलमोहर की छाव में पकड़ गए कचनार
गली गली में राधाये गली गली में कृष्ण
मन ही मन उत्तर मिले नही पूछने प्रश्न
वैसे तो सब भूल गए फिर भी है कुछ याद
झरने जैसी थी हँसी मिसरी जैसी बात