Friday, June 18, 2010
Thursday, June 17, 2010
गैस है तो रिसेगी ही
बहुत दिनों बाद आज रामखिलावन के चक्कर में बलभद्र पड़े ,माहौल आन मिलो सजना सा हो चला था ,बलभद्र रामखिलावन से पूछ रहे थे दादा गैस और हवा में क्या अंतर होता है सुनो इस तरह के ज्वलंत प्रश्न हमसे न पूछा करो कितनी बार कहा है और तुम हो की सुधरने का नाम नहीं ले रहे रहे हो ,फिर वही लफड़े वाले कश्चन आनषर सुनो ये राम लीला बंद करो और सुनो चुपचाप पालथी मार के बैठो नहीं तो andarshan दर्शन दे देगा और फिर अंतर्ध्यान हो जायेगा ,मरे मरे फिरोगे फिर ,इन्कलाब जिंदाबाद करते ,जो हमसे टकराएगा चूरचूर हो जायेगा खुद चुर चुर हो गए है चिलाते चिलाते ये नहीं दिख रहा है उन्हें खुद इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे है और जिंदगी फास हो गयी है बॉस की न बोलते बन रहा है न चिल्लाते
जब गैस और हवा में फर्क ही देखना है तो सुन जो फर्क हिंदुस्तान और अमेरिका में है वही फर्क गैस और हवा में है ,समझा गैस हिंदुस्तान में निकलती है और हवा अमेरिका में बहती है ,अमेरिका में बहने वाली हवा हिंदुस्तान आते आते गैस में बदल जाती है और फिर निकल भागती है हवा जब अमेरिका में बहती है तो वह मंद मंद बहती है मुस्काती है महकती है मदमस्त करती है और वही जब सात समुन्दर पार कर हिंदुस्तान आती है तो थक जाती है सफ़र भी लम्बा है थक थूका कर सो जाती है उठती है तो गैस के रूप में निकलती है विभस्त रूप में अस्त्वस्त कर देती है गंधाती है लोगो को समूचा लील लेती है उसके लीलने से जो बचते है वो इन्कलाब जिंदाबाद करते है गैस निकल कर फिर अमेरिका पहुच जाती है वहा पहुच फिर अपने मूल स्वरुप हवा में बहने लगती है मंद मस्तानी । गैस जो हिंदुस्तान में लोगो की हवा निकाल चुकी होती है अमेरिका में मंद मंद बहती है ,जहा से निकलती है वह स्थान दर्शनीय हो जाता है निकालने वाले अंतर्ध्यान हो जाते है हमारे देश के अमरीकी पण्डे दान दक्झिना ले कर जजमान की विदाई कर देते है जाओ जाओ अपने देश ये देश पराया है अपने देश में जा कर बहो फिर जब निकलना हो तब आना ,फिर निकलना फिर नजराना देना जय हो जय हो .करते पण्डे अपने को चना मुर्रा बाटने में व्यस्त कर लेते है हम आप जो अपने आप को ज्ञानी मान बैठे है महा ज्ञानियों के चक्कर में सुध बुध खो खा कर जिंदाबाद- जिंदाबाद ,मुर्दाबाद -मुर्दाबाद के मंत्र गुनगनाने- भुनभुनाने लगते है
सुना बलभद्र हवा और गैस में क्या अंतर होता है ?
बलभद्र को जैसे सब कुछ समझ में आ गया था के भाव चहरे पर उतराने लगे थे
दादा हवा बहती क्यों है और गैस निकलती क्यों है क्या गैस बह नहीं सकती और हवा निकल नहीं सकती ?
बेटा सब कुछ हो सकता है समय और परिस्थिति के साथ सब बदला बदली हो सकती है युग के साथ जैसे सब बदलता रहता है मन बदलते है तन बदलते है भाव भंगिमाए बदलती है मौसम बदलते है ऐसे ही गैस हवा में और हवा गैस में बदल सकती है ,हा हा दादा समझ में आया .............जैसे हम मुह से या नाक से हवा लेते है और पिछवाड़े से गैस भो से या पो से निकालते है कुछ लोग तो बिना आवाज के भी हवा को गैस में बदल देते है क्या कमाल करते है किसी को कुछ पता भी नहीं चलता और हवा गैस में बदल जाती है और निकल कर फिर हवा में बदल जाती है है न कमाल ..........पंडो पुरोहितो को भी पता नहीं चल पता नहीं तो जिंदाबाद मुर्दाबाद भुनभुनाने लगते क्या बात है दादा मान गए ..........
suno
गैस
Wednesday, April 14, 2010
Monday, April 12, 2010
इस देश का यारो क्या कहना

अरे दादा अपनोऊ ,सकारे- सकारे .......
रामखिलावन कान माँ जनेऊ खोसे खासे एक हाथ में लोटिया लिए और दुसरे हाथ से मुखारी ,मुह में घुसेड़े ,बीच बीच में इधर उधर जहा जी चाहे थूकते खखारते दिसा कर दातून करते गृह ग्राम की ओर खरामा -खरामा ,लौट रहे थे तभी बलभद्र महाशय ,टहलते -टहलते उसी ओर जातेदिख गए और रुक गए बलभद्र रुके तो वो सब भी रुक गया जिस लिए वो जा रहे थे हाथ माँ लोटिया लै,दादा ,कोई कह रहा था सो सुना और जो सुना वो सुना रहे है
रामनिहोर कह रहे थे क्या गा रहे थे जोर जोर से .........".इस देश का यारो क्या कहना " ....ये देश है ......
क्या कहना का मतलब ........समझ में नहीं आ रहा है ,और इसी चक्कर में जो कुछ करने जा रहे थे सब रुक रुका गया
रामखिलावन बोले अरे ससुरे पहले हो हुआ लो नहीं तो यही कछनी में पोक- पाक दोगे तो अभी वही कहेगा कि इस बलभद्र का यारो क्या कहना
बलभद्र के सर के बहुत ऊपर से जहा ,पर दिखता नहीं था वहा से रामखिलावन का उक्त उदबोधन निकल गया और वो सुन समझ नहीं पाये कि रामखिलावन ने क्या कहा
खैर कोई बात नहीं ,कछनी बीच में दगा न दे जाये मात्र इस भय से बलभद्र भागते हुए ,कुछ झाड़ियो के पीछे उकडू बैठ गए ,कब तक ये वही बलभद्र जाने बलभद्र फारिक हो ,मौका ऐ बारदात से ऐसे निकल लिए ,जैसे कुछ किया ही न हो तभी उनके दिमाग में एक लल्लन टॉप आइडिया बिना पूछे पाछे घुस गया ,जो बहार निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था इस तरह की बकलोली बलभद्र के साथ अकसर हो जाती अब तक वे गर्भवती महिलाओ की तरह चलते चलते गाव के किनारे पहुच रहे थे तभी किसी ने एक डेला सनसनाते हुए उसी तरफ दनदना दिया जिस तरफ से रामखिलावन की सवारी गाव में प्रवेश का रही थी हद हो गयी इन ससुरे गाव वालो को कौन सुधारे ,मन में विचार आया की जब देश नहीं सुधरा तो इस इस ससुरे गाव की क्या बिसात कि सुधर जाये यह विचार जैसे आया था वैसे ही चला गया क्यों कि दिमाग में घुसा लल्लन टॉप आइडिया किसी और सोच विचार को ज्यादा देर टिकने नहीं दे रहा था वैसे भी बलभद्र के दिमाग में जगह कुछ कम ही बची थी क्यों कि अभी आधी से ज्यादा जगह वो ससुरा लल्लन टॉप आइडिया घेरे था शेष जगह पहले से भरे कबाड़ और उटपटागख्यालो ने घेर रखी थी
बलभद्र सोच रहे थे कि ये डेला जो अभी अभी स्कर्ट मिसाइल की तरह पास ही गिरा है अगर हमारे मुह माँ या इस नश्वर शरीर के किसी अंग में आ धमकता क्या होता अंग भंग तो तय था ऐसा उनका विचार बन रहा था विचारो का आना जाना .कुछ देर रुकना और फिर गंतब्य की तरफ निकल जाना कुछ विचार मॉल गाडियों की तरह कुछ ज्यादा देर भी रुके रहते जैसे अभी लल्लन टॉप आइडिया घुस कर नाहक रुका हुआ है सिगनल होने के इंतजार में जाने कब तक रुका रहे यह बलभद्र को भी नहीं मालूम था
बलभद्र
Friday, April 9, 2010
रामखिलावन उवाच

Sunday, April 4, 2010
प्रेम व्रेम कर कुरा लो .........
बेटा ,प्रेम के लिए पड़ोस की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है
निगरानी भी बनी रहती है
कोई आवारा जानवर तो नहीं घुस रहा है , तुम्हारी जमीन में यदि घुसा या घुसने की कोशीश भी करता दिख जाता है तो ,फसल ख़राब करने या चरने के पहले ही तुम उसे दे ,धमकते हो और वो मिमियाते ,दोनों टांगो के बीच दूम दबाये ,दबी में खिसक लेता है ऐसे जैसे गलती से माता के दरबार में मथा टेकने जा पंहुचा था ,मनौती पूरी हो गयी समझ कर रोट बताशा और चठाता है दूसरी बार उधर देखना भी गुनाह समझाता है ,सोटाई जो इतनी घलती है ,सब प्रेम व्रेम धरा रह जाता है बस सेकाई भर याद रहती है
भैया बलभद्र वैसे तो तुम प्रेम व्रेम के फ्रेम में अपने को न जड़ लेना नहीं तो जड़े ही रह जाओगे ,खड़े भी न हो पाओगे
फिर न कहना की दादा अब का करी , अंडा करी में बस, अंडा की तरह लहराओगे ,छिलके उतार के
बलभद्र ,रामखिलावन का प्रेम के बारे में उनका व्याख्यान अनमने मन से सुन रहे थे क्योकि मन तो दे आये थे जहा देना था ,तन था जो और तनतना और रहा था ,रामखिलावन की रामलीला देख कर
बलभद्र को रामखिलावन , रावन से कम नहीं लग रहा था इस वक्त ,रामखिलावन ,बलभद्र को फूटी आँख नही सोहा रहे थे
प्रेम में टोका टाकी वर्जित होना चाहिए ऐसा बलभद्र का मानना था
प्रेम के बारे में बलभद्र की अलग फिलाशफी थी ,जैसे प्रेम कभी नहीं मरता , चाहे खुद मर जाये
प्रेम कही भी फसफासा सकता है ये जरूरी नहीं की प्रेम केवल पड़ोस में ही किया जाये ,ये बात गले उतरती है,ठीक भी लगती है , कि प्रेम के लिए पड़ोस की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है लेकिन अब तो नई नई तकनीके आ गयी है ,नए नए बीज आ गए है ,हाईब्रीड बीज आ गए है बाजार में ,खादे ,तरह तरह की आ गयी है ,और ये रामखिलावन है कि ,लगे है अभी भी गोबर की खाद में फसल उगाने ,खुद मरेंगे और दूसरो को भी मरवाएंगे
प्रेम के बारे में बलभद्र का दर्शन बड़ा विकट था , जो केवल निकट से ही समझा जा सकता था
बलभद्र का यह कहना और सोचना था कि ,प्रेम केवल निकट से ही ,निकट में ही किया जा सकता है क्योकि ,दूर के ठोल, सुहावने भर दिखते है , होते नहीं है
प्रेम के बारे में उनके विचार बड़े मौलिक तो थे ही साथ ही साथ वो भयंकर सुन्दर भी थे वे प्रेम के वर्तमान स्वरुप में ही विश्वाश रखते थे भूत काल के प्रेम को वे भूल जाने को कहते और भविष्य काल के प्रेम में उनका कतई विश्वास नहीं था
उनका यह भी मत था कि जब भी मौका लगे ,या सधे ,प्रेम व्रेम कर कुरा लो , नहीं तो कही मरमूरा गए तो बस एक बंगला बने न्यारा भर रह जायेगा जो कभी नहीं बनता
Friday, April 2, 2010
रिश्ते मर गए है
बलभद्र लोटन कबूतर की तरह जगह जगह का स्वाद लेत -देत ,उठते -गिरते,धम्म से रामखिलावन की ,खटिया के पास आ धमके और रामखिलावन के मन में आ जा रहे
विचारो में खलल पैदा कर दी ,रामखिलावन के मुह से कोई शुद्ध देशी गाली निकलने ही वाली थी की अचानक रुक गयी क्यों रुक गयी ये उन्हें भी नहीं मालूम पड़ सका वे स्तभ्य से रह भर गए जैसे देशी कट्टे से कारतूस निकने के पहले चलते ही किच्च बोल दे और धरे के धरे रह जाये इस बीच दुश्मन अटैक कर दे ,सो अलग मर मुरा जाये तो कोई बड़ी बात नहीं
रिश्ते मर गए है हम जिन्दा है क्यों जिन्दा है मौत नहीं आई कब आयेगी , पता नहीं इसे छोड़ , सब मालूम है ,कुछ भी पूछा लो पूरब- पश्चिम ,उतर-दखिन ब्रम्हा ,विष्णु ,महेश सब जानते है भैया ,पड़ोस की खबर नहीं होनालूलू के बारे में जानते है खुद को छोड़ सब को जानते है भैया ,बोलो क्या उखाड़ लोगे
रिश्ते बनते ही है , टूटने के लिए ,जैसे हम- तुम ,रिश्ते जिए जाते है जीने के लिए हम-तुम मरे जा रहे है जीने के लिए ,लगता है कि कुछ अंतर है इबारत में
रिश्ते बनते है तो निभाए भी जाते है जो नहीं निभाते वो रिश्ते नहीं स्वार्थ है ,रिश्ते स्वार्थी नहीं होते हम-तुम स्वार्थी होते है ,जैसे हम -तुम होते है वैसे ही हमारे रिश्ते हो जाते है
रामखिलावन यही सब सोच रहे थे कि सब गुड -गोबर हो गया ,बलभद्र आ गया
नहीं दादा बोलो बोलो सुने तो रिश्ते क्या से क्या हो गए क्यों मर रहे है जब कि हम जिन्दा है
चिंतन और चिता एक साथ भला कैसे हो सकते है ,जहा चिंतन है वह चिता नहीं हो सकती और जहा चिता है वहा चिंतन कैसे हो सकता है ,हा समसान वैराग्य से सनसनाये वैरागी ,मनीषी जरूर मिल जाते है अड़गम बगड़म करते उन्ही को हम पहुचे हुए मान लेते है जानते कुछ नहीं बस मान लेते है ,कौन सर खपाए जानने के लिए मान लो ,मानाने में क्या बिगड़ता है ,हम तो शूरू से माने बैठे है माना कि अ ब स एक त्रिभुज हैहै, भैया अब क्या कर लोगे क्या उखाड़ लोगे न भी हो तो
रिश्ते कोई दाग नहीं है कि सर्फ़ एक्सल से धो लिया और चल दिए ,पेट का दर्द नहीं है कि पुदिन हरा पिया और सब ठीक हो गया ,इनो पियो और जियो
क्या बात है ,कुछ रिश्ते खुद बनते है कुछ बनाये जाते है जो खुद बनते है उसमे खुदा की मर्जी होती है और जो खुद बनाये जाते है उसमे खुद की मर्जी होती है मर्जी का अन्तर
हमें कहा से कहा पहुचाता है क्या क्या कराता है ये तो आप को भी मालूम होगा कि बताना होगा ? नहीं ...........बताये ..........अरे का कर रहे हो पोल न खुलवाओ ,खुल जायेगी तो का होगा रामखिलावन बोले
बलभद्र बोले जाने दो दादा जाने दो अ ब स एक त्रिभुज है
कहा गयी वो नानी की कहानिया ,नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए बाकि जो बचा था काले चोर ले गए .........................
घर बड़े हो गए है दिल छोटे हो गए हैओहदा बड़ा हो गया है ,सोच छोटी हो गयी है अपने लिए दयालु दूसरो के लिए मर्यादित हो गए है बोलो बलभद्र कुछ तुम भी बोलो ......
का बोले बोलने को अब बचा ही का है
रिश्ते सस्ते हो गए है
रिश्ते किस्से हो गए है
रिश्ते मर गए है .................